Wednesday, October 19, 2011

Hindi Short Story Kitne Nark By M.Mubin


कहानी   कितने नरक  लेखक  एम मुबीन   


सवेरे जब वह घर से निकली थी तो बुशरा  बुखार में तप रही थी.
"अम्‍मी ! मुझे छोड़कर मत जाओ, अम्‍मी  आज स्कूल मत जाओ मुझे बहुत डर लग रहा है."
जब वह जाने की तैयारी कर रही थी तो बुशरा  की आंख भी खुल गई थी और वह उसे आज स्कूल न जाने के लिए जिद कर रही थी.
"नहीं बेटे!" प्यार से उसे समझाने के लिए जब उसने उसके माथे पर हाथ रखा तो कांप उठी. बुशरा  के माथे बुखार से तप रही थी.
"अम्‍मी  से इस तरह की ज़िद नहीं करते." यह कहते हुए उसकी भाषा लड़खड़ा गई थी. "आज अम्‍मी  का स्कूल जाना बेहद जरूरी है. कल चाहे रोक लेना. तुम कहो तो कल हम आठ दिनों के लिए स्कूल नहीं जायेंगे तुम्हारे पास ही रहेंगे. आज हमें जाने दो. "
"अम्‍मी  रुक जाओ नां! मुझे अच्छा नहीं लग रहा है." बुशरा  रोने लगी थी.
"नहीं रोते बेटे!" बुशरा  को रोता देख कर उसकी आंखों में भी आंसू आ गए थे. परंतु बड़ी मुश्किल से उसने अपने आंसुओं को रोका था और भुराई हुई आवाज़ पर काबू पाने की कोशिश की थी. "हम आज जल्दी घर आ जायेंगे फिर तुम्हारे अब्बा तो तुम्हारे पास ही हैं नां बेटा. डरने की कोई बात नहीं है. "
दूसरे कमरे में तारिक़ और ावफ बेखबर सो रहे थे. थोड़ी देर सिसककते रहने के बाद बुशरा  की भी आंख लग गई थी. उसने अपना परस कंधे पर लटका और जाकर धीरे से तारिक़ को हिलाने लगी.
"आं! क्या बात है?" तारिक़ ने आंख खोल दी.
"मैं जा रही हूँ." वह बोली. "बुशरा  को सख्त बुखार है उसे डॉक्टर के पास ले जाना. नौकरानी से कह देना कि उसका अच्छी तरह ध्यान रखे. यदि संभव हो तो आज आप छुट्टी कर लें. वैसे मैं आज जल्दी आने की कोशिश करूंगी परंतु कह नहीं सकती कि यह संभव हो सकेगा भी या नहीं क्योंकि आज इन्‍सपेकशन  है. यदि इन्‍सपेकशन  न होता तो आज जाती ही नहीं. "
"ठीक है." तारिक़ ने उठते हुए जमाही ली. वह जब घर से बाहर आई तो चारों ओर गहरा अंधेरा था. सर्दियों के दिनों में सात भी बज जाते हैं तो अंधेरा ही छाया रहता है दिन नहीं निकलता और उस समय तो केवल साढ़े पांच ही बजे थे. पूरी गली सुनसान थी. रास्ते पर इक्का दुक्का लोग आ जा रहे थे. ऐसे आलम में किसी औरत के घर से निकलने की कल्पना भी नहीं किया जा सकता है. वह प्रतिदिन उसी समय अकेली उस गली से गुज़र कर रिक्शा स्टैंड तक जाती जो लोग सवेरे जल्दी जागने के आदी थे. उन्हें पता था कि वह उस समय घर से स्कूल जाने के लिए निकलती है. ननवा लोग उससे दो बातें कर लिया करते थे.
"बेटी स्कूल जा रही हो."
"हाँ बाबा." वह उत्तर देती.
"भाबी अकेली अँधेरे में प्रतिदिन  इतने सवेरे जाती हो तुम्हें डर नहीं लगता?"
"अब तो आदत हो गई है." वह मुस्कुरा कर कहती.
सभी ननवा और अच्छे नहीं होते. कभी कभी कोई अजनबी और बदमाश भी मिल जाता है. अकेले में उस समय किसी अजनबी औरत को देख कर वह जो कुछ कर सकता है वह करने से नहीं चौकता था. कभी कोई भद्दा सा वाक्यांश मुंह से निकाल देता . कभी कोई नागवार बात कह देता. कोई तो जसारत कर धक्का देकर आगे बढ़ जाता और अपनी किसी मानसिक  इच्छा की संतोष कर लेता. ऐसी स्थिति में इस प्रक्रिया सिवाय ख़ामोशी और कुछ नहीं होता था. न तो वह से उलझ सकती थी न शोर मचा कर अपनी मदद के लिए किसी को बुला सकती थी. उलझी तो नुकसान उसी का होता. अकेली औरत जो ठहरे. किसी को मदद के लिए बुलाती तो संभव नहीं था कि कोई उसकी मदद को आता. इतने सवेरे कोई अपनी लाखों रुपए की मीठी नींद खराब करता है? अगर कोई आए भी तो बदमाश से तो उसे मुक्ति मिल जाती परंतु मदद करने के वाक्यों से शायद जीवन भर मुक्ति  नहीं मिलती.
"इतनी रात गए अकेली घर से निकली हो. शरीफ़ औरतों के क्या यही चाल चलन हैं?"
"यदि इज़्ज़त का उतना ही पास है तो अकेली इतने सवेरे घर से क्यों निकलती है. घर में रहा करो. छोड़ दो यह नौकरी." गरज वह ऐसी बातों से कतरा के लिए अपने साथ हुए जा रहे बे जा व्यवहार को अनदेखा कर आगे बढ़ जाती थी. रिक्शा स्टैंड से एस टी के लिए उसे पाँच मिनट में रिक्शा मिल जाता था. कभी कभी तो उसे रिक्शा तैयार मिल जाता था कभी दो चार मिनट रिक्शा का इंतजार करना पड़ता था. कुछ रिक्शा वालों को पता था वह उस समय वहां से एस. टी स्टैंड जाने के लिए निकलती है तो वह उसके इंतजार में वहाँ पहुँच जाते थे. इसमें भी उन लोगों की नियत के दो पहलू होते थे. कुछ शरीफ लोग अपनी रोज़ी धंधे के लिए की सीट पाने के लिएवहाँ पहुँचते थे. कुछ बदमाश मानसिकता वाले केवल स्वाद के लिए वहाँ पहुँचते थे कि एक अकेली अकेले खूबसूरत जवान लड़की को अकेले रिक्शा में एस. टी स्टैंड तक पहुँचाने का अवसर मिलेगा. उससे कुछ ऐसी भी बातें हो सकती हैं जो उनके लिए मानसिक  स्वाद का कारण हूँ. ऐसी हालत में वह ख़ामोश रहकर यात्रा को प्राथमिकता देती थी.
उनका कोई उत्‍तर  नहीं देती थी या यदि देती भी तो ऐसा उत्‍तर  देती कि उसकी सारी उम्मीदों और इरादों पर पानी फिर जाए. ऐसी स्थिति में जो दुर्घटना संभव था वह एक बार इसके साथ हो चुका था. सन्नाटे और अंधेरे का लाभ उठाकर एक रिक्शा वाले ने उसे गलत रास्ते पर ले जाना चाहा. उसने चीख कर उसे रोका जब उसने नहीं सुना तो चलते रिक्शे से कूद गई. उसे मामूली चोटें आईं परंतु उसकी सौभाग्य था कि सामने पुलिस खड़ी थी और उसे रिक्शा से कूदती देखा तो दौड़कर उसके पास पहुंचे.
"क्या बात है मैडम, क्या आप रिक्शा से गिर गईं?"
"नहीं! वह रिक्शा वाला मुझे अकेली देख कर गलत रास्ते पर ले जा रहा था."
"ऐसी बात है?" यह सुनते ही दो पुलिस वाले गाड़ी लेकर भागे. थोड़ी देर बाद ही वह रिक्शा को मारते हुए उसके पास ले आए उन्होंने शायद उसे बुरी तरह मारा था. उसके माथे से खून बह रहा था .
"बहन जी मुझे क्षमा कर दो! अब जीवन भर ऐसी गलती नहीं करूंगा." वह उसके पैरों पर गिर कर गिड़गिड़ाते लगा तो उसने पुलिस वालों से कहा कि उसके विरूध  कोई कार्रवाई न करे उसे छोड़ दे. इस घटना को तो उसने अपने तक ही सीमित रखा था परंतु रिक्शा वालों में शायद इस घटना का प्रचार हो गई थी क्योंकि उसके बाद उसके साथ ऐसा कोई घटना पेश नहीं आया था.
इस घटना से वह स्‍वंय  बहुत डर गई थी. उसने सोचा था कि वह अपना रूपांतरण दोपहर की नलं में करा ले जाएगा. इसके लिए उसने काफी हाथ पैर भी मारे थे. परंतु बात नहीं बन सकी थी. रूपांतरण करने वाले इतनी कीमत मांग रहे थे जितनी देना उसकी बिसात के बाहर था. वैसे दोपहर की नलं उसके और उसके घर वालों के पक्ष में भी उचित नहीं थी. दोपहर की नलं करने के लिए उसे सवेरे नौ दो बजे घर से निकलना होगा और वापसी शाम सात आठ दस बजे तक संभव ही नहीं हो सकेगी. ऐसी स्थिति में घर, ावफ और बुशरा  का कौन ध्यान रखेगा. तारिक़ ड्यूटी देखेगा या घर और बच्चों को?
इसलिए उसने दूसरी नलं लेने का इरादा बदल दिया था. सवेरे की नलं के लिए उसे साढ़े पांच बजे के समीप  घर से निकलना पड़ता था. इस तरह से वह ठीक वक्त पर स्कूल पहुंच भी जाती थी. स्कूल से दो ढाई बजे के समीप  वापस घर आ जाती थी. तारिक़ दस ग्यारह बजे तक घर में ही रहता था उसके बाद नौकरानी आ जाती उसके आने तक नौकरानी घर और बच्चे संभाली थी. साढ़े पांच बजे घर छोड़ने के लिए उसे चार बजे जागने पड़ता था. जागने के वह अपने और बच्चों के लिए सवेरे का नाश्ता और कभी कभी दोपहर का खाना बनाती थी हाँ! कभी देर हो जाती तो यह जिम्मेदारी नौकरानी पर डालनी पड़ती. सारे काम करके वह ठीक वक्त पर घर से निकल जाती थी. निकलते समय वह हल्का सा नाश्ता कर लेती थी परंतु स्कूल में उसे भूख लग ही जाती थी. अवकाश में उसे हल्का नाश्ता करना ज़रूरी हो जाता था. इसके बाद वह घर आकर ही खाना खाती थी.
बस स्टैंड पहुंचने के बाद उसे पुणे छह बजे बस मिल जाती थी. यह बस भी समझमह थी. कभी बिल्कुल खाली होती थी तो कभी इतनी भीड़ कि पैर रखने के लिए भी मुश्किल से जगह मिलती थी. बस खाली हो या भीड़ उसे उसी से यात्रा करना आवश्यक होता था. अगर वह बस छूट जाए तो निश्चित समय पर स्कूल लगना ना मुमकिन था. क्योंकि 20 किलोमीटर का पल सरा् सा यात्रा उसी बस द्वारा निर्धारित समय में तय करना संभव था. वरना भिवंडी थाना यात्रा? भगवान की शरण. भिवंडी से निकले लोग नासिक पहुँच जाये परंतु थाना जाने के लिए निकले रास्ते में ही फंसे रहे. खराब रास्ता, आवागमन, यात्रियों, बस कंडकटर, चालक के झगड़े. सुबह के समय आवागमन कम होती थी भीड़ कम होने की वजह से कंडकटर का मूड भी अच्छा होता था. इसलिए यह यात्रा निश्चित समय में पूरा हो जाता था. इसके बाद थाने से आधे घंटे का लोकल ट्रेन यात्रा. उसमें बहुत कम परेशानी होती थी. दो चार मिनट में कोई तेज या धीमी लोकल मिल जाती थी. सवेरे का समय होने के कारण लोकल में भीड़ नहीं होती थी. कभी सामान्य डिब्बे में जगह मिल जाती थी तो कभी लीडीज़ डिब्बे में. हाँ! किसी मजबूरी के तहत भीड़ होने की वजह से खड़े होकर यात्रा करना भी भारी नहीं पड़ता था.
लीडीज़ डिब्बे में खड़े होकर यात्रा करने में तो कोई समस्या पेश नहीं आती थी परंतु जनरल डिब्बे में खड़े होकर यात्रा करना औरत के लिए प्रकोप  से कम नहीं है. धक्के शरीर की हड्डी पसलियां एक कर देते हैं. और एक औरत को तो कुछ अधिक ही धक्के लगते हैं और विशेष रूप से नाजुक स्थानों पर. ऐसा लगता है जैसे कई गध अपनी नवकीली चौनचों से उसका मांस नोच रहे हैं. कभी राहत भरा आराम तो कभी प्रकोप  भरा यह सफर तय करने के बाद कुछ क़दमों का पैदल यात्रा और उसके बाद स्कूल. कैसी अजीब बात थी.
तीस चालीस किलोमीटर से आती थी. परंतु कभी कभी वे सबसे पहले स्कूल आने वाली एकमात्र शिक्षक होती थी. या पहले नहीं भी आती थी तो लेट कभी नहीं होती थी. मगर स्थानीय शिक्षक हमेशा देर से आते थे. इसके बाअस्तित्‍व  अगर किसी दिन मजबूरी से एक आध घंटा देर से स्कूल पहुँचती तो लोग नाक भौं चढ़ाने. और देरी से आने के लिए उसे उत्‍तर  देना पड़ता था या उसकी उपस्थिति में लेट मार्क किया जाता था. वह उसके विरोध भी करती तो उसका विरोध बेअसर रहता. क्योंकि स्कूल में कोई लॉबी नहीं था. लॉबी न होने की वजह से उसके विरोध में न तो शक्ति थी और न प्रभाव. जिनकी लॉबी मजबूत थी वह सारे कानून को ताक पर रखकर नौकरी करते थे.
स्कूल से वह साढ़े बारह बजे के समीप  निकलती थी. थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद रेलवे स्टेशन और स्थानीय से थाना. और थाना आने के बाद भिवंडी  तक पीड़ा नअक यात्रा.
जब भी वह थाना भिवंडी  के बीच यात्रा करती थी उसे सरा् मसतकीम की याद आती थी. दिन महशर के बाद बन्दों को जिस बाल से बारीक पुल से यात्रा करना होगा जिसके नीचे नरक की आग महक रही होगी. वह यात्रा कितना यातना नाक होगा इसका तो माना जा सकता था. परंतु इस यात्रा को तय करते हुए जो यातना सहन  करनी पड़ती थी उसकी कोई सीमा नहीं थी.
पहले बस की लाइन में घंटों खड़े रहना धक्के खाना. प्रकार के लोगों की नापाक नजरों का निशाना बनना. फिर दानसतगी या नादानसतगी से लगाए उनके हवस नाक धक्कों को अपने शरीर पर झेलना. बस आई और जगह मिल गई तो गनीमत वरना फिर भीड़ में खड़े खड़े यात्रा. भीड़ में घुटता दम और शरीर का निकलता कचूमर. इस यात्रा में यात्रा करने वाले यात्री भी कितने बे हस होते हैं.
कोई खड़ा है इससे उन्हें कुछ लेना देना नहीं होता है. उन्हें जगह मिल गई उनके लिए बस यही काफी है. कोई भूल कर भी यह नहीं सोचे कि कोई औरत खड़ी है. उसे बैठने के लिए जगह देनी चाहिए. अगर कोई इतनी फ़्रापदिली करेगा तो फिर उस फ़्रापदिली मूल्य भी प्राप्त करने की कोशिश करेगा. उस फ़्रापदिली की यातना नाक भुगतान करने से बेहतर तो है धक्के सहते हुए शरीर के बीच घट कर खड़े खड़े यात्रा करें. महिला थकी हुई है, गर्भवती या बीमार है कोई इस बारे में नहीं सोचता. उसकी इन स्थितियों पर दया खा कर कोई उसे जगह देने की कोशिश नहीं करता. यदि जगह देता है तो उससे मूल्य प्राप्त करने की नियत है. चाहे वह किसी भी हालत में हो . फिर ऐसी हालत में यह यात्रा और लंबी हो जाता है.
किसी दिन कोई एक्सटेंडिड हो गया जिसकी वजह से यातायात जाम हो गई और फिर सामान्य आने में घंटों लग गए और एक आधे घंटे की यात्रा दो तीन घंटे शामिल हो गया. घटना नहीं भी हुआ तो बेतरतीब से घुसने वाले वाहनों के कारण से यातायात जाम हो गई.
मामूली मामूली बातें कभी बड़ी बड़ी वजह बन कर कई घंटे बरबाद कर देती हैं. जब वह घर पहुँचती है तो भूख चमकी हुई है. सारा शरीर थकान से टूट रहा है आंखों में नींद समाई होती है. उसे कुछ वझाई नहीं देता है वह क्या करे खाना खाये, आराम करे या सोए उसके आते ही बच्चे उसे घेर लेते हैं वह उससे लिपट कर इतनी देर की दूरी के एहसास को कम करना चाहते हैं. और थकान की वजह से बच्चों के शरीर की निकटता भी उसे बिजली का तार महसूस होती है. बड़ी मुश्किल से पलंग पर लेट कर थोड़ी देर सस्ता कर फिर अपने कामों में लग जाती है. यदि नौकरानी ने खाना नहीं बनाया तो उसे खाना बनाना पड़ता है. इस बीच तारिक़ भी आ जाता है और फिर सब मिल कर खाना खाने बैठ जाते हैं. कभी वह जल्दी आ गई तो सब साथ ही खाना खा लेते हैं. कभी देर हो गई तो निर्धारित समय पर तारिक़ और बच्चे खाना खा लेते हैं. उसे अकेले ही खाना पड़ता है. खाना खाने के बाद एक दो घंटे की नींद का सामान्य है. एक दो घंटे सोने के बाद उसकी सारी थकान दूर हो जाती है. और तरोताज़ा होकर घर के कामों में लग जाती है.
घर के छोटे मोटे काम करना, रात का खाना बनाना, शाम बाज़ार जाकर शॉपिंग करना आदि आदि. परंतु जरूरी नहीं कि प्रतिदिन  जीवन का यह सामान्य है. कभी कभी सामान्य में मामूली बदलाव भी बड़ी यातना नाक साबित होती है. आज बुशरा  को सख्त बुखार आ गया. शाम से ही उसे हल्का हल्का बुखार था. आधी रात के बाद बुखार की तीव्रता बढ़ गई और अब वह तप रही है. उसका स्कूल जाना भी ज़रूरी है. इन्‍सपेकशन  जो है. एक महीने अगर वह स्कूल न तो चल सकता है परंतु इन्‍सपेकशन  के दिन न जाए यह कैसे संभव है?
एक मुहावरा है उस दिन तो बिस्तर मरग से उठ कर भी स्कूल आना जरूरी है. वह कई सालों से कोशिश कर रही है कि उसे भिवंडी का कोई टीचर मिल जाए जो उसके साथ मयूचौल ले. और प्रतिदिन  इस पल सरा् यात्रा से मुक्ति  मिल जाए. चाहे उसमें उसे वेतन में नुकसान सहना पड़े. परंतु आज तक यह संभव नहीं हो सका है. उस तरह कई शिक्षक मुंबई पढ़ाने जाते हैं. और मुंबई से शिक्षक पढ़ाने के लिए भिवंडी  आते हैं.
सब समस्याओं एक हैं. परंतु कोई भी उसे ऐसा हम विचार नहीं मिलता जो यातना से दोनों को उद्धार. घर बाल बच्चे पति भिवंडी  हैं नौकरी के लिए मुंबई जाना पड़ता है. जब तक विवाह  नहीं हुई थी कोई समस्या नहीं था यहयात्रा किसी तकलीफ का कारण नहीं था. हर दिन एक नया अनुभव और एक नया ाीडोनचर होता था. विवाह  के बाद भी कोई समस्या नहीं पैदा हुआ. केवल जल्दी घर पहुँच कर पति को देखने की इच्छा मन में ाँगड़ाईाँ लेती रहती थी. परंतु के बाद बच्चे आ गए और समस्याओं बढ़ते गए.
घर में कोई नहीं था जिनके भरोसे बच्चों को छोड़ कर संतुष्ट हो कर ड्यूटी पर जा सके. सब कुछ नौकरों के सहारे और उनके भरोसे करना पड़ता था पता नहीं नौकर बच्चों का अच्छी तरह ध्यान रखते भी होंगे या नहीं. बस यही प्रशन   हर क्षण मन को कचौकता रहता था. कई बार तो मन में आया नौकरी छोड़ दे. मियाँ बीवी में सलाह भी हुआ परंतु यह तय भावनात्मक फैसला साबित हुआ. जब सामने सच्चाई की प्रवेश दीवारें आईं तो यह फैसला उससे टकरा कर पाश पाश हो गया . अभी अभी नया घर लिया था.
तारिक़ की आधी से अधिक वेतन फ्लैट के लिए ऋण के सप्ताह भुगतान में खर्च हो जाती थी. अल्प आय के सहारे भिवंडी  जैसे महँगे शहर में जिंदा रहना भी हर चीज़ के लिए तरस तरस कर दिन मरना था. इसलिए नौकरी भी आवश्यक थी. और नौकरी के लिए प्रतिदिन  यातना यात्रा भी जरूरी था. बच्चे बुखार में तप रहे थे परंतु फिर भी स्कूल जाना जरूरी. घर पहुंचने की जल्दी परंतु ऐसे हालात पैदा हो गए कि सामान्य से दो चार घंटे लेट लगना पड़े.
प्रतिदिन  समय पर स्कूल जाना हो जाता था. एकाध बार बस या ट्रेन देर से चलने के कारण स्कूल पहुंचने में देरी हो गई और उसी दिन किसी अधिकारी ने स्कूल का दौरा किया. और हाथ में देरी से स्कूल आने का मीमो आ गया. रक्षा में बैठी तो कोई बुशरा  की बीमारी के साथ इन्‍सपेकशन  होने की वजह से जल्दी या समय पर स्कूल पहुंचने का विचार था. समय पर बस भी मिल गई और बैठने के लिए जगह. परंतु रास्ते में बस ड्राइवर एक ट्रक वाले से उलझ गया . उनके झगड़े में पंद्रह मिनट देर हो गई. थाने स्टेशन पर आई तो तेज लोकल निकल चुकी थी. धीमी ट्रेन दस मिनट देर से आई. स्कूल पहुंची तो पूरे आधे घंटे देरी हो गई थी.
शिक्षा अधिकारी आ चुका था और इन्‍सपेकशन  शुरू हो चुका था. "श्रीमती मोमिन! आपको शर्म आनी चाहिए. आप आधा घंटा लेट स्कूल आई हैं. उससे तो यही लगता है आप इन्‍सपेकशन  के दिन लेट आई हैं तो प्रतिदिन  तो कई घंटे लेट आती हूंगी. आप इस तरह लेट स्कूल आकर बच्चों का कितना नुकसान कर रही हैं आपको एहसास है? सरकार आपको वेतन क्यों देता है? "अधिकारी का लेक्चर सुनना पड़ा था. और अपनी विवश्‍ता  पर उसकी आंखों में आंसू आ गए. वह क्या उत्‍तर  दे उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. दिन भर इन्‍सपेकशन  चलता रहा परंतु इसका कोई बुशरा  में उलझा रहा. पता नहीं कैसी होगी? बारह बजे के समीप  एक ननवा ने आकर खबर दी कि भिवंडी  से तारिक़ का फोन आया है कह रहे हैं कि तुम तुरंत आ जाओ बुशरा  की तबीयत बहुत खराब है.
उसने तारिक़ को ननवा संख्या दे रखा था ताकि यदि उसे कोई ज़रूरी संदेश देना हो तो वहां संपर्क करे. वे भी उसे तुरंत सूचित कर देते थे. वह तुरंत स्कूल से निकल गई. स्टेशन आकर लोकल में बैठी और स्थानीय चल दी. परंतु थोड़ी दूर जाकर रुक गई.
किसी नेता पर हमला हुआ था. उसके विरोध कर लोगों ने ट्रेन सेवा बंद कर दी थी विरोध करने वालों को पुलिस को पटरियों से हटाने में दो घंटे लग गए उसके बाद ट्रेन चली. थाने से स्पेशल रिक्शा कर वह घर आई तो पता चला बुशरा  को अस्पताल में भर्ती कराया गया. अस्पताल में पलंग पे बुशरा  बेहोश लेटी थी उसके हाथ में सरनज लगी हुई थी उससे कतरा कतरा दवाई टपक कर नली द्वारा उसके शरीर में जा रही थी.
"बुखार बहुत बढ़ गया था इसलिए ऐडमट करना पड़ा." तारिक़ ने बताया तो वह अचानक फूट फूट कर रोने लगी. यह सोचकर कि मरने के बाद तो इंसान केवल एक पल सरा् से गुजरना होगा. परंतु जीते जी इसे कितने पल सरा् से गुजरना पड़ता है?

 
...
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल  09322338918

Hindi Short Story Rehai By M.Mubin


कहानी      रिहाई    लेखक  एम मुबीन   

दोनों चुपचाप पुलिस स्टेशन के कोने में रखी एक बेंच पर बैठे साहब के आने का इंतजार कर रहे थे. उन्हें वहां बैठे तीन घंटे हो गए थे. दोनों में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक दूसरे से बातें करें. जब भी दोनों एक दूसरेको देखते और दोनों की नज़रें मिनतीं  तो वह एक दूसरे को दोषी मानते.
दोनों में से दोष किसका था, वह स्‍वंय  अभी तक यह तय नहीं कर पाए थे. कभी लगता वे अपराधी हैं कभी लगता जैसे एक पाप के आरोप  में दूसरे को सज़ा मिल रही है. समय गुजारे के लिए वह अंदर चल रही गतिविधियों की समीक्षा करते. उनके लिए यह जगह बिल्कुल अजनबी थी. दोनों को याद नहीं आ रहा था कि कभी उन्हें किसी काम से भी उस जगह या ऐसी जगह जाना पड़ा था. या कभी जाना पड़ा हो तो भी वह स्थान ऐसा नहीं था .
सामने लॉक अप था. छ सलाखों वाले दरवाजे और दरवाजों के छोटे छोटे कमरे. हर कमरे में आठ दस लोग बंद थे. कोई सो रहा था तो कोई ऊँघ रहा था, कोई आपस में बातें कर रहा था तो कोई सलाखों के पीछे से झांक कर कभी उन्हें तो कभी पुलिस स्टेशन में आने वाले सिपाहियों को देख कर भददे अंदाज़ में मुस्कुरा रहा था.
उनमें से कुछ के चेहरे इतने भयानक और कर्कश थे कि उन्हें देखते ही अंदाज़ा हो जाता था कि उनका संबंध अपराधियों से है या वह स्‍वंय  अपरधी हैं. परंतु कुछ चेहरे बिल्कुल उनसे मिलते जुलते थे. मासूम भोले भाले. सलाखों के पीछे से झांक कर बार बार उन्हें देख रहे थे. जैसे उनके भीतर उत्सुकता जागा है.
"तुम लोग शायद हमारे समुदाय से संबंध रखते हो. तुम लोग यहां कैसे ऑन फंसे?"
 वह जब भी चेहरों को देखते तो दिल में एक ही विचार आता कि देखने में  तो यह भोले भाले मासूम और शिक्षित लोग लगते हैं यहां कैसे  इस नरक में ऑन फंसे.
बाहर दरवाजे पर दो बंदूक धारी  पहरा दे रहे थे. लॉक आपके पास भी दो सिपाही बंदूक लिए खड़े थे. कोने वाली मेज़ पर एक वर्दी वाला लगातार कुछ लिख रहा था. कभी कोई सिपाही आकर उसकी मेज़ के सामने वाली कुर्सी पर बैठ जाता तो वह अपना काम छोड़ कर उससे बातें करने लगता. फिर उसके जाने के बाद अपने काम में व्यस्त हो जाता था.
उसके बाजू में एक मेज़ खाली पड़ी थी. उस मेज़ पर दोनों के ब्रेफ केस रखे हुए थे. उनके साथ और भी लोग रेलवे स्टेशन से पकड़ कर लाए गए थे उनका सामान भी उसी मेज़ पर रखा हुआ था. वे भी साथ ही बेंच पर बैठे थे परंतु किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक दूसरे से बातें कर सके. एक दो बार इनमें से कुछ लोगों ने आपस में बातें करने की कोशिश की थी. उसी समय सामने खड़ा सिपाही गरज उठा.
"हे चुप! आवाज़ मत निकालो, शोर मत करो. यदि शोर किया तो लॉक अप में डाल दूंगा."
इसके बाद उन लोगों ने कानाफूसी में भी एक दूसरे से बातें करने की कोशिश नहीं की थी. वह सब एक दूसरे के लिए अजनबी थे. या संभव है एक दूसरे केा  जानते हों जिस तरह वह और अशोक एक दूसरे के जान पहचानवाले  थे. ना केवल जान पहचान वाले  बल्कि दोस्त थे. एक ही ऑफिस में वर्षों से काम करते थे और साथ ही इस संकट  में गिरफ्तार हुए थे.
आज जब दोनों ऑफिस से निकले थे तो दोनों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इस तरह संकट  में गिरफ्तार हो जाएंगे.
ऑफिस से निकलते हुए अशोक ने कहा था. "मेरे साथ जरा बाजार चलोगें ? एक छुरी का सेट खरीदना है. पत्नी कई दिनों से कह रही है, परंतु व्यस्तता के कारण बाजार तक जाना नहीं हो रहा है."
"चलो!" उसने घड़ी देखते हुए कहा. मुझे सात बजे की तेज लोकल पकड़ना है और अब छह बज रहे हैं. इतनी देर में हम यह काम निपटा सकते हैं. "वह अशोक के साथ बाजार चला गया था.
एक दुकान से उन्होंने छु‍िरयों का सेट खरीदा था. उस सेट में विभिन्न आकार की आठ दस छुरियां थीं. उनकी धार बड़ी तेज थीं और दुकानदार का दावा था प्रतिदिन  उपयोग के बाद भी दो सालों तक उनकी धार खराब नहीं होगी क्योंकि यह स्टेन लैस स्टील की बनी हुई हैं मूल्य भी वाजिब था.
भुगतान कर अशोक ने सेट अपनी अटैची में रखा और वह बातें करते हुए रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए. स्टेशन पहुंचे तो सात बजने में बीस मिनट बाकी थे दोनों की तेज लोकल के आने में पूरे बीस मिनट बाकी थे.
तेज ट्रेन वाले प्लेटफार्म पर अधिक भीड़ नहीं थी धीमी ट्रेन वाले प्‍लेटफार्म  पर अधिक भीड़ थी लोग शायद बीस मिनट तक किसी गाड़ी का इंतजार करने की तुलना में धीमी गाड़ियों से जाना पसंद कर रहे थे.
अचानक वह चौंक पड़े. प्‍लेटफार्म  पर पूरी पुलिस  फोर्स   आई थी. और उसने प्‍लेटफार्म के हर व्यक्ति को अपनी जगह स्तब्ध कर दिया था. दो तीन सिपाही आठ आठ दस दस लोगों को घेर लेते उनसे पूछताछ कर उनके सामान और सूट केस, अटैचयों की तलाशी लेते कोई संदेहास्पद   वस्तु न मिलने की स्थिति में उन्हें जाने देते या यदि उन्हें कोई संदिग्ध या ईच्छि‍त  वस्तु मिल जाती तो तुरंत दो सिपाही उस व्यक्ति को पकड़ कर प्‍लेटफार्म से बाहर खड़ी पुलिस जीप में बिठा आते.
उन्हें भी तीन सिपाहियों ने घेर लिया था.
"क्या बात है हवलदार साहब?" उसने पूछा. "यह तलाशियां क्यों ली जा रही हैं?"
"हमें पता चला है कि कुछ आतंकवादी   इस समय प्‍लेटफार्म से हथियार ले जा रहे हैं. उन्हें गिरफ्तार करने के लिए यह कार्रवाई की जा रही है." सिपाही ने उत्‍तर  दिया.
वह कुल आठ लोग थे जिन्हें उन सिपाहियों ने घेर रखा था उनमें से चार की तलाशियां हो चुकी थीं और उन्हें छोड़ दिया गया था. अब अशोक की बारी थी.
शारीरिक तलाशी लेने के बाद अशोक को ब्रेफ केस खोलने के लिए कहा गया. ब्रेफ केस खोलते ही एक दो चीजों को उलट पलट कर देखने के बाद जैसे ही उनकी नज़रें छु‍िरयों के सेट पर पड़ी वह उछल पड़े.
 "बाप रे इतनी छुरियां? साब हथियार मिले हैं. "एक ने आवाज देकर थोडी दूर खडे इन्सपेक़्टर को बुलाया.
"हवलदार साहब यह हथियार नहीं हैं. सब्जी तरकारी काटने की छु‍िरयों का सेट है." अशोक ने घबराई हुई आवाज़ में उन्हें समझाने की कोशिश की.
"हां हवलदार साहब यह घरेलू उपयोग की छु‍िरयों का सेट है हमने अभी बाजार से खरीदा है." उसने भी अशोक की सफाई पेश करने की कोशिश की.
"तो  तू भी इसके साथ है, तू भी इसका साथी है?" कहते हुए एक सिपाही ने तुरंत उसे दबोच लिया. दो सिपाही पहले ही अशोक को दबोच चुके थे. "हम सच कहते हैं हवलदार साहब यह हथियार नहीं हैं यह घरेलू उपयोग की छु‍िरयों का सेट है." अशोक ने एक बार फिर उन लोगों को समझाने की कोशिश की.
"चुप बैठ!" एक जोरदार डंडा उसके सिर परपड़ा.
"हवलदार साहब आप मार क्यों रहे हैं?" अशोक ने विरोध किया.
"मारें नहीं तो क्या तेरी पूजा करें. यह हथियार साथ लिए फिरता है. दंगा  फसाद  करने का इरादा है. ज़रूर तेरा संबंध आतंक  संगठनों से है." एक सिपाही बोला और दो सिपाही उस पर डंडे बरसाने लगे. उसने अशोक को बचाने की कोशिश की तो उस पर भी डंडे पडने लगे. उसने खैरियत इसी में समझी कि चुप रहे. दो चार डंडे उस पर पड़ने के बाद हाथ रुक गया. परंतु अशोक का बुरा हाल था. वह जैसे ही कुछ कहने के लिए मुंह खोलता उस पर डंडे बरसने लगते और विवश उसे चुप होना पड़ता.
"क्या बात है?" इस बीच इंस्पेक्टर वहां पहुंच गया जिसे उन्होंने आवाज दी थी.
"साब उसके पास हथियार मिले हैं."
"उसे तुरंत थाने ले जाओ." इन्‍सपेक्‍टर  ने आदेश दिया और दूसरी ओर बढ़ गया. चार सिपाहियों ने उन्हें पकड़ा और घसीटते हुए प्लेटफार्म के बाहर ले जाने लगे. बाहर एक पुलिस जीप खड़ी थी. इस जीप में उन्हें बिठा दिया गया जीप में दो चार आदमी बैठे थे. इन सब को चार सिपाहियों ने अपनी सुरक्षा में ले रखा था. उसी समय जीप चल पड़ी.
"आप लोगों को किस आरोप में गिरफ्तार किया गया है?" जैसे ही उन लोगों में से एक आदमी ने उनसे पूछने की कोशिश की एक सिपाही का फ़ोलादी मक्का उसके चेहरे पर पड़ा.
"चुपचाप बैठा रह नहीं तो मुंह तोड़ दूँगा." इस आदमी के मुंह से खून निकल आया था वह अपना मुँह पकड़ कर बैठ गया. और मुंह से निकलते खून को जेब से रूमाल निकाल कर साफ करने लगा.
पुलिस स्टेशन लाकर उन्हें उस कोने की खंडपीठ पर बैठा दिया गया और उनका सामान उस मेज़ पर रख दिया गया जो शायद इंस्पेक्टर की थी. जब वह पुलिस स्टेशन पहुंचे तो निरंतर लिखने वाले ने लाने वाले सिपाहियों से पूछा.
"ये लोग कौन हैं? उन्हें कहां से ला रहे हो?"
"रेलवे स्टेशन पर छापे के दौरान पकड़े गए हैं उनके पास से संदिग्ध चीजें या हथियार बरामद हुए हैं."
"फिर उन्हें यहाँ क्यों बैठा रहे हो? उन्हें लॉक अप में डाल दो."
"साहब ने कहा है कि उन्हें बाहर बिठा कर रखो वह आकर उनके बारे में फैसला करेंगे." बेंच पर बैठा पहले उनकी अच्छी तरह तलाशी ली गई थी. कोई संदेहास्पद वस्‍तु  बरामद नहीं हुई यही गनीमत था. उनकी पुलिसस्टेशन आने की थोड़ी देर बाद दूसरा जथा पुलिस स्टेशन पहुंचा. वह भी आठ दस लोग थे शायद उन्हें किसी दूसरे इंस्पेक्टर ने पकड़ा था इसलिए उन्हें दूसरे कमरे में बिठाया गया. और भी इस तरह के कितने लोग लाए गए उन्हें अंदाज़ा नहीं था क्योंकि वह केवल कमरे की गतिविधियां देख पा रहे थे जिसमें वह मकीद थे.
नए सिपाही आते तो उन पर एक उचटती नज़र डालकर अपने साथियों से पूछ लेते. "यह कहां से पकड़े गए हैं. जुए घर से, ब्लू फिल्म देखते हुए या वेश्‍याओं के अड्डों से?"
"हथियारों की खोज में. आज रेलवे स्टेशन पर छापा मारा था. वहां पर पकड़े गए हैं."
"क्या बरामद हुआ?"
"पर्याप्त तो कुछ भी बरामद नहीं हो सका. खोज जारी है. साब अभी नहीं आए हैं. आईं तो पता चलेगा कि खबर सही थी या गलत और छापे से कुछ हासिल हुआ है या नहीं?"
जैसे जैसे समय बीत रहा था उसके दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. अशोक की हालत गैर थी. उसके चेहरे पर उसके दिल की स्थिति उभर रही थी. हर क्षण ऐसा लगता था जैसे वह अभी चकरा कर गिर जाएगा. उसे अनुमान था जो भय से डर रहा है अशोक की आशंकाएं कुछ अधिक ही होंगे. उसे इस बात का संतोष था तलाशी में उसके पास से कोई भी संदेहास्पद वस्तु बरामद नहीं हुई थी. इसलिए न तो पुलिस इस पर कोई आरोप लगा सकती है न उस पर हाथ डाल सकती है. परंतु संकट  यह थी कि वह अशोक के साथ गिरफ्तार हुआ है. अशोक पर जो भी आरोप पत्र लगाया जाएगा इसमें उसे भी बराबर का हिस्सा दिया जाएगा. कभी कभी उसे गुस्सा आ जाता .
'आखिर हमें किस अपराध में गिरफ्तार किया गया है, किस अपराध में हमारे साथ आदी अपराधियों सा अपमान जनक व्‍यवहार किया जा रहा है और यहां घंटों से बिठा कर रखा गया है और हमे अपमानित  की जा रही है? हमारे पास तो ऐसी कोई संदेहास्पद  आपत्तिजनक  वस्‍तु  बरामद नहीं हुई है. वह छु‍िरयों का सेट? वह तो घरेलू उपयोग की चीजें हैं. उन्हें अपने पास रखना या कहीं ले जाना कोई अपराध नहीं है. अशोक इन चीजों से कोई हत्या और रक्तपात या दंगा फसाद नहीं करना चाहता था वह तो उन्हें अपने घर अपने घरेलू उपयोग के लिए ले जाना चाहता था. "परंतु किससे ये बातें कहे, किस के सामने अपनी बेगुनाही की सफाई पेश करे. यहां तो आवाज़ भी मुँह से निकलती है तो उत्‍तर  में कभी गालियां मिलती हैं तोकभी घूँसे. इस संकट  से कैसे छुटकारा मिल दोनों अपनी अपनी तौर पर सोच रहे थे जब सोचों से घबरा जाते तो कानाफूसी में एक दूसरे से एक दो बातें कर लेते.
"अनवर अब क्या होगा?"
"कुछ नहीं होगा अशोक! तुम धैर्य  रखो. हमने कोई अपराध नहीं किया है."
"फिर हमें यहां यूँ क्यों बिठा कर रखा गया है. हमारे साथ आदी अपराधियों का व्यवहार क्यों किया जा रहा है?"
"यहाँ के रूप तरीके ऐसे ही हैं. अब हमारा केस किसी के सामने गया भी नहीं है."
"मेरा साला  स्थानीय एम. एल. ए का दोस्त है. उसे फोन करके सारी बातें बता दें, वह हमें इस नरक से मुक्ति  दिला देगा."
"पहली बात तो ये लोग हमें फोन करने नहीं देंगे. फिर थोड़ा धैर्य  रखो इंस्पेक्टर के आने के बाद क्या स्थिति पैदा होती है उस समय इस बारे में सोचेंगे."
"इतनी देर हो गई घर न पहुंचने पर पत्नी चिंतित हो गयी."
"मेरी भी यही स्थिति है. एक दो घंटे लेट हो जाता हूँ तो वह घबरा जाती है. इन लोगों का कोई भरोसा नहीं कुछ न मिलने की स्थिति में किसी भी आरोप में फंसा देंगे."
"अरे सब उनका पैसा खाने के लिए यह नाटक रचाया गया है." बगल में बैठा आदमी उनकी कानाफूसी  की बातें सुनकर फुसफुसाया. "कड़की लगी हुई है किसी अपराधी से हफता  नहीं मिला होगा या उसने हफता  देने से इन्‍कार कर दिया होगा. उसके विरूध  तो कुछ नहीं कर सकते उसकी भरपाई करने के लिए हम शरीफों को पकड़ा गया है. "
"तुम्हारे पास क्या मिला?" उसने पलट कर उस आदमी से पूछा.
"एसिड की बोतल." वह आदमी बोला. "उस एसिड से मैं अपने बीमार पिता के कपड़े धोता हूं जो कई महीनों से बिस्तर पर है. उसकी बीमारी के जीवाणु मर जाएं उनसे किसी को नुकसान न पहुंचे इसके लिए डॉक्टर ने उसके सारे कपड़े इस एसिड में धोने के लिए कहा है. आज एसिड समाप्त हो गया था वह मेडिकल स्टोर से खरीद कर ले जा रहा था. मुझे क्या पता था इस संकट  में पड़ जाऊँगा. वरना मैं अपने घर के पास के मेडिकल स्टोर से खरीद लेता. "
"हे! क्या खुसर पुसर चालू है?" उनकी कानाफूसी सुनकर एक सिपाही दहाड़ा तो वह सहम कर चुप हो गए. मन में फिर अशंकाएं सिर उठाने लगे. यदि अशोक पर कोई   अपराध लगा के गिरफ़्तार कर लिया गया तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा. अशोक की मदद करने वाला साथी उसे करार देकर इस पर भी वही आरोप पत्र लगाना कौन सी बड़ी बात है. पुलिस तो उन पर आरोपपत्र लगा उन्हें अदालत में पेश कर देगी. उन्हें अदालत में अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी. और भी अपराध को साबित करने में सालों लग जाएंगे. वर्षों अदालत कचहरी के चक्कर. इस कल्पना से ही उसे झुरझुरी आ गई. फिर लोग क्या कहेंगे किस किस को वह अपनी बेगुनाही की दास्तान सुना कर अपनी सफाई पेश करेंगे.
अगर पुलिस ने उन पर आरोप पत्र लगा तो मामला केवल अदालत तक सीमित नहीं रहेगा. पुलिस उनके बारे में बढ़ा चढ़ा कर अखबारों में भी उनके अपराध की कहानी छपवा देगी. अखबार वाले तो इस तरह की कहानियों की ताक में रहते हैं.
"दो सफेद पोशों के काले कारनामे."
"एक कार्यालय में काम करने वाले दो क्लर्क आतंकवादियों के साथी निकले."
"एक कुख्यात गिरोह से संबंध रखने वाले दो गुंडे गिरफ्तार."
"दंगे  के लिए हथियार ले जाते हुए दो गुंडे गिरफ्तार."
"शहर के दो शरीफ लोगों का संबंध खतरनाक आतंकवादी   संगठनों से निकला." इन बातों को सोच कर वह अपना सिर पकड़ लेता. जैसे जैसे समय बीत रहा था. उसकी हालत खराब  हो रही थी और उसे इन बातों विचारों से छुटकारा पाना मुश्किल हो रहा था.
ग्यारह बजे के समीप  इंस्पेक्टर आया वह गुस्से में भरा था.
"नालायक, पाजी, हरामी, साले कुछ भी झूठी खबर  देकर हमारा समय खराब करते हैं. सूचना है कि आतंकवादी   रेलवे स्टेशन से खतरनाक हथियार लेकर जाने वाले हैं. कहां हैं आतंकवादी  , कहां है हथियार? चार घंटे रेलवे स्टेशन पर मगज़ पाशी करनी पड़ी. रामू यह कौन लोग हैं? "
"उन्हें रेलवे स्टेशन पर शक में गिरफ्तार किया गया था."
"एक एक को मेरे पास भेजा."
एक आदमी उठ कर इंस्पेक्टर के पास जाने लगा और सिपाही उसे बताने लगे कि इस व्यक्ति को किस लिए गिरफ्तार किया गया है.
"उसके पास से एसिड की बोतल मिली है."
"साहब वह एसिड घातक नहीं है. इससे मैं अपने बीमार पिता के कपड़े धोता हूं. वह एक मेडिकल स्टोर से खरीदी थी. उसकी रसीद भी मेरे पास है और जिस डॉक्टर ने यह लिख कर दी है डॉक्टर की स्टेटमैंट भी. यह कीटनाशक एसिड है. बर्फ की तरह ठंडा. "वह व्यक्ति अपनी सफाई पेश करने लगा.
"जानते हो एसिड लेकर लोकल ट्रेन में यात्रा करना अपराध है?"
"जानता हूँ साहब! परंतु यह एसिड आग लगाने वाला नहीं है."
"अधिक मुंह ज़ोरी मत करो. तुम्हारे पास एसिड मिला है. हम तुम्हें एसिड लेकर यात्रा करने के जुर्म में गिरफ्तार कर सकते हैं."
"अब मैं क्या कहूं साहब!" वह आदमी विवश्‍ता  से इंस्पेक्टर का मुंह ताकने लगा.
"ठीक है तुम जा सकते हो परंतु भविष्य एसिड लेकर ट्रेन में यात्रा नहीं करना."
"नहीं साहब अब तो ऐसी गलती फिर कभी नहीं होगी." कहता हुआ वह आदमी अपना सामान उठाकर तेजी से पुलिस स्टेशन के बाहर चला गया.
अब अशोक की बारी थी.
"हम दोनों एक कंपनी के सेल्‍स  विभाग में काम करते हैं. यह हमारे कार्ड है. कहते अशोक ने अपना कार्ड दिखाया मैंने छु‍िरयों का सेट घरेलू उपयोग के लिए खरीदा था और घर ले जा रहा था. आप देखिए यह घरेलू उपयोग कीछरियां हैं.
"साब उनकी धार बहुत तेज है." बीच में सिपाही बोल उठा.
इंस्पेक्टर एक छुरी उठाकर उसकी धार परखने लगा.
"सचमुच उनकी धार बहुत तेज है. उनके एक ही वार से किसी की जान भी ली जा सकती है."
"इस बारे में क्या कह सकता हूं साहब!" अशोक बोला. "कंपनी ने इस तरह की धार बनाई है. कंपनी को इतनी तेज धार वाली घरेलू उपयोग की छुरियां नहीं बनानी चाहिए."
"ठीक है तुम जा सकते हो. इंस्पेक्टर अशोक से बोला और उससे संबोधित हुआ.
"तुम?"
"साहब यह इसके साथ था."
"तुम भी जा सकते हो परंतु सुनो." उसने अशोक को रोका. पूरे शहर में इस तरह की तलाशियां चल रही हैं. यहां से जाने के बाद संभव है तुम उन छु‍िरयों की वजह से किसी और जगह धर लिए जाओ. "
"नहीं इंस्पेक्टर साहब अब मुझ में छुरियां ले जाने की हिम्मत नहीं है. मैं उसे यहीं छोड़ जाता हूँ." अशोक बोला तो इंस्पेक्टर और सिपाही के चेहरे पर विजयी मुस्कान उभर आई.
वे दोनों अपने अपने ब्रेफ मामले उठाकर पुलिस स्टेशन के बाहर आए तो उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्हें नरक से रिहाई का आदेश मिल गया है.

अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
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Hindi Short Story Akela By M.Mubin


कहानी      अकेला   लेखक  एम मुबीन   


अचानक उसे लगा कि वह जंगल में बिल्कुल अकेला है. इस बात का एहसास होते ही वह काँप उठा. उसके हृदय की धडकनें तेज हो गईं. भय की लहरें उसके शरीर में दौड़ने लगीं और माथे पर पसीने की बूँदें उभर आईं. आवाज़ जैसे गले में घुट कर रह गई.
चारों ओर दूर दूर तक फैला भयानक जंगल और उस पर छाया पर होल सन्नाटा उसे किसी अजगर की तरह पहुंच के लिए आगे बढ़ रहा था.
जंगल का एक गोनग उसे पर आसेब और पर ख्र महसूस होने लगा.
उसकी समझ में नहीं आ रहा था यह सब अचानक कैसे हो गया?
वह अचानक जंगल में कैसे रह गया है?
बाअस्तित्‍व  लाख कोशिशों के वह पता नहीं लगा सका कि वह कब और क्यों अकेले हुआ. जहां तक उसे याद था वह जंगल में अकेला नहीं था वह तो कई लोगों में घिरा हुआ था. वह सब एक जगह साथ बैठते थे आपस में हंसी मजाक करते थे एक दूसरे के दुख दर्द और तनहाईाँ बांटने थे. किसी को कभी महसूस ही नहीं होता था कि वह जंगल में अकेले हैं उनके घर भी आसपास ही थे और एक तरह से जंगल में उस जगह एक अच्छी खासी बस्ती आबाद थी जिसमें जीवन की गहमागहमी थी. परंतु उसे याद नहीं आ रहा था वे सभी अचानक कहाँ और कैसे उसे इस जगह अकेले छोड़ कर चले गए हैं और तो और जाते समय अपने साथ अपने घर और अपनी हर चीज़ भी खूबी से लेकर चले गए हैं यह पता ही नहीं चल सका.
अचानक हवा के चलने से जंगल में एक भयानक आवाज गूंज लगी और उस आवाज को सुनकर उसका दिल किसी सूखे पत्ते की तरह लरज़ने लगा.
"तुम सब कहाँ हो?" जब से सहन  नहीं हुआ तो वह चीख उठा.
"तुम लोग मुझे अकेला छोड़ कर कहाँ चले गए हो? मुझे बहुत डर लग रहा है."
परंतु उसकी आवाज़ जंगल के परहोल सन्नाटे में गूंज रह गई वह लाख अपनी सदा के उत्‍तर  में जवाबी सदा के लिए बेचैन रहा. परंतु उसकी आवाज़ किसी गुंबद में गूंज वाली रेडियो गूँज बनकर रह गई और इस जंगल में गूंजती रही.
वह गूंज क्षण बह क्षण तेज से तेजी से होता गया और अंत में इतनी भयानक हो गई कि उसे अपने कानों के पर्दे फटने लगती महसूस होने लगे. घबरा कर ध्वनि ाज़त से बचने के लिए उसने अपने कानों में अपनी उंगलियां ठौंस लें.
अचानक एक नीज़ा हवा में लहराता हुआ आया और उसने कुछ क़दमों की दूरी पर आकर भूमि पीोस्त हो गया. भय से उसका रंग पीला पड़ गया और सारा शरीर पसीने में भीग गया. उसे लगा कि यह पहला और आखिरी नीज़ा नहीं वह चारों ओर से नीज़ों के बीच घिरा हुआ है. वह नीज़े इसके आसपास छिपे हुए हैं.
अचानक उस पर नीज़ों की बरसात सी होने लगी. नीज़ों की नवकीं आकर उसके शरीर से टकराएँ है और उसका शरीर लहोहान होकर अपनी आत्मा को खोदे है. वह अच्छी तरह देख रहा था उसके चारों ओर हजारों नीज़े तने हुए हैं. समय समय वह नीज़े उसके पास आ आकर गिर रहे थे. कभी कभी कोई भाला आकर उसके शरीर से टकरा जाता और उसके शरीर को घायल कर देता. यह कैसा प्रकोप  है उसकी समझ में नहीं आ रहा था. पहले तो उसने उस जगह कभी नीज़ों को नहीं देखा था पहले तो इस पर कभी इस तरह नीज़ों से हमला नहीं हुआ था वह आठ सालों से वहां रह रहा था.
अचानक उसे अपने पास लकड़ी का एक टुकड़ा नज़र आया. उसने लकड़ी का वह टुकड़ा उठा लिया और उससे ढाल का काम लेने लगा. जैसे ही हवा में सुरसुराने हुआ कोई भाला उसके शरीर को छूने के लिए आगे बढ़ता वह लकड़ी के टुकड़े से उसे रोक लेता था. वह भाला रुक जाता था परंतु यह बड़ा मुश्किल काम था. क्योंकि कभी कभी नीज़े लकड़ी के टुकड़े में धनस उसके हाथों को घायल कर देते थे.
उसकी समझ में नहीं आ रहा था उनके नीज़ों इस पर कौन और क्यों हमला कर रहा है? हमलावर उसे दिखाई नहीं दे रहे थे.
अचानक उसे एक पेड़ की आड़ में एक साया नजर आया उसके हाथ में भाला था उसकी ओर फेंकने के लिए जैसे ही उसने भाला ताणा उसने उसके साये को अच्छी तरह देख लिया. उसे रूप और सूरत कुछ ननवा सी लगी.थोड़ा याद करने पर उसे याद आया कि यह वही शख्स है जो कुछ क्षणों पहले उसके साथ था जब वह अकेला नहीं था. उसे बड़ी हैरानी हुई. कुछ पल पहले तक का उसका मूनस और गमसुार उसका वह दोस्त उसकी जान केदरपे क्यों हो गया है? इस पर नीज़े से हमला क्यों कर रहा है? उसने घबरा कर चारों ओर देखा तो उसे कुछ नजर नहीं आया. परंतु उसे लगा चारों तरफ पेड़ों की आड़ में उस पर हमला करने के लिए नीज़े ताने वही लोग छिपे हुए हैं जो कुछ पल पहले तक उसके साथ थे.
"तुम! तुम लोगों को मैं पहचान गया हूँ. तुम मुझ पर हमला करके मेरी जान क्यों लेना चाहते हो?" वह चीख उठा.
"मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ. तुम भी मेरे दोस्त हो. कुछ देर पहले तक हम साथ रहते थे और एक दूसरे के मूनस और गमसुार थे. उसकी इस बात को सुनकर कई चेहरे पेड़ों की ऊट से बाहर आए सभी चेहरे इस के ननवा थे. परंतु उस समय उनके चेहरे पर इसके लिए दुश्मनी की भावना मचल रहे थे. उनके होंटों पर ज़हरीली मुस्कान थी और आँखों में उसके लिए नफरत की भावना था.
"तुम लोग मेरे साथ हो. फिर मेरी जान क्यों लेना चाहते हो?" उसने उनसे पूछा.
उत्‍तर  कई नीज़े उसके शरीर से टकराने के लिए आगे बढ़े और वे सभी चेहरे फिर पेड़ों की ऊट में छुप गए. उसने जल्दी से स्‍वंय  का बचाव किया और चीख उठा.
बचाव! बचाव. में संकट  में हूं, जो कल तक मेरे दोस्त थे आज मेरी जान के दरपे हैं मुझे मार डालना चाहते हैं. बचाव में सख्त संकट  में हूँ. "
"हमें पता है तुम सख्त संकट  में हो." उसे दूर से एक ननवा आवाज़ आती महसूस हुई. उसे याद आया कि यह आवाज भी उन लोगों में से किसी की है जो कुछ क्षणों पहले उसके साथ थे. "फिर तुम मेरी मदद के लिए क्यों नहीं आ रहे हो? "उसने पूछा." हम तुम से इतनी दूर हैं कि चाहकर भी तुम्हारी मदद के लिए नहीं आ सकते हैं. हमें पता है तुम कौन मुसीबतों में घिरे हुए हो और भविष्य तुम पर क्या मसेबतें आने वाली हैं. हम जिस जगह हैं वहां हमें कोई ख़तरा नहीं है. हमने उन्हें ख़तरों खदशों के कारण वह जगह छोड़ दी. "
"जब तुम्हें पता था कि इस जगह रहने में हमें खतरा है और इन्हीं ख़तरों से बचने के लिए तुम यहाँ से चले गए हो. तो तुम मुझे भी साथ क्यों नहीं लिया, तुमने मुझे आने वाले ख़तरों से आगाह क्यों नहीं किया?"
"तुम भूल रहे हो. हमने तुम्हें इन खतरों से आगाह करते हुए उस जगह को छोड़ देने का सुझाव दिया था परंतु तुमने हमारा मजाक उड़ाया था और यह दलील पेश की थी कि इस जगह कोई ख़तरा नहीं है खतरा इस जगह अधिक है जहाँ हम खतरों से बचने के लिए जा रहे हैं. जोखिम यहां भी हैं परंतु इस जगह से कम जहां इस समय तुम हो. "दूर से आवाज आई, उस आवाज को सुनकर उसे याद आया कभी इस संबंध में उनकी बातचीत हुई थी परंतु ने खदशों को ैक्सर निराधार कहकर अनदेखा कर दिया था.
"अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ?" उसने पूछा.
परंतु उसे कोई उत्‍तर  नहीं मिला उसने फिर दुहराया. वह उसी जगह बालक अकेला है और खतरों में घिरा हुआ है इन ख़तरों से बचने के लिए उसे कुछ न कुछ करना चाहिए. जो लोग उसकी जान के दरपे हैं उसे उनसे ही पूछना चाहिए वह उसकी जान के दरपे क्यों हो गए और क्या चाहते हैं?
"सुनो मेरी जान के दुश्मन मैं तुमसे पूछ रहा हूँ. तुम जो कुछ पल पहले तक मेरे संगी थे अब मेरे रकेब क्यों बन गए हो तुम मेरी जान क्यों लेना चाहते हो?" "हम चाहते हैं जिस तरह तुम्हारे दूसरे साथी उस जगह को छोड़ कर चले गए हैं तुम भी चले जाओ." पेड़ों की ऊट एक ननवा स्थिति उभरी.
"परंतु क्यों?"
"क्योंकि यह जगह हमारी है."
"परंतु कुछ देर पहले तो यह जगह किसी की नहीं थी. यह जगह हम सब की थी. फिर अब यह जगह मेरी न होकर केवल तुम्हारी क्यों हो गई है?"
"जिस क्षण तुम्हारे दूसरे साथी उस जगह को छोड़ कर दूसरी जगह चले गए और उन्होंने इस जगह को अपनी जगह कहकर जंगल वितरण किया उसी क्षण से यह जगह हमारी और सिर्फ हमारी हो गई है. अब तुम्हें यहाँ रहने का कोई हक़ नहीं है. तुम यहाँ से चले जाओ. वहां पर जहां तुम्हारे दूसरे साथी चले गए हैं "." परंतु तुम भी तो मेरे साथी हो, क्या मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता हूँ? "
"तुम हमारे साथ नहीं रह सकते, तुम्हारे साथ थे जो उस जगह को छोड़ कर चले गए. अगर तुमने यह जगह नहीं छोड़ी तो हम इसी तरह तुम पर हमले करते रहेंगे और तुम्हें यह जगह छोड़ने के लिए मजबूर कर देंगे. या फिर तुम्हारी जान ले लेंगे. "
"तुम इतने बदल क्यों गए हो? किसी की जान लेने में भी कोई ार महसूस नहीं कर रहे हो, यह तो वहशयों का काम है."
"जंगल में वहशी ही रहते हैं."
"तो मुझे यह जगह छोड़कर जाना ही होगा?"
"हां!"
"ठीक है मैं अपने साथियों से कहता हूँ कि मैं आ रहा हूँ ..... साथ! तुम सच कहते हो यहाँ मेरे लिए बहुत खतरे हैं. उनके खतरों से मुक्ति  पाने के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूँ."
"नहीं!" दूर से आवाज आई. "तुम यहां नहीं आ सकते अब यहाँ किसी को आने की अनुमति नहीं है. अब उनके खतरों से निपटना, वहां रहना या न रहना या कहीं चले जाना यह तुम्हारा अपना समस्या है. इस समस्या को तुम ही नपटो. "
"यह क्या संकट  है. तुम मुझे वहाँ आने नहीं दे रहे हो. और यहाँ के लोग मुझे यहाँ रहने नहीं देना चाहे हैं. मैं क्या करूँ?" उसे कोई उत्‍तर  नहीं मिला. उसकी समझ में नहीं आ रहा था वो क्या करे? यहां उसे खतरा था, परंतु कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां जाने के बाद वह सुरक्षित हो और यहाँ तो खतरा बदस्तूर कायम था ही बल्कि इसमें बढ़ोतरी भी होता जा रहा था. अचानक उसे अपना घर आग की लपटों में घिरा हुआ नज़र आया. वह तेजी से अपने घर की आग बुझाने के लिए दौड़ा. परंतु पूरी कोशिश के बाअस्तित्‍व  वह अपने घर को जलने से नहीं बचा सका. अपना अध जला घर देख कर उसकी आंखों में आंसू आ गए. परंतु फिर एक संकल्प से उसने अपने आँसू पोछें . केवल घर ही जला है ना? घर तो फिर भी बन सकता है. अब उसने अपना संकल्प पूरा नहीं किया था कि एक दलख़राश चीख ने उसे लरज़ा दिया. उसे अपना बेटा लहू लुहाण नज़र आया. उसका सारा शरीर नीज़ों से भरा हुआ था. उसकी आंखें बेजान थीं. बेटे का शव देखकर वह चीख उठा. पता नहीं कितनी देर तक वह आह और बेज़ारी करता रहा. फिर यह सोच कर बेटे को दफन करने के लिए गढ़ा खोदे लगा.
"एक दिन मनुष्य के शरीर को उसकी आत्मा को छोड़ना ही है. कभी जल्दी कभी देर से. शायद यह भी मेरे बेटे की आत्मा का मेरे बेटे के शरीर को छोड़ने का एक बहाना हो."
"सुनो!" अचानक वह पूरी ताकत से चीख उठा. "तुम यह सोच रहे हो कि मैं अकेला इस जंगल में नहीं रह सकता? मुझे मेरी तन्हाई का एहसास दिलाव हैं, मुझ पर तरह तरह की मसेबतें और ज़ुल्म व सितम डखाउ तो में यह जंगल छोड़कर चला जाऊँगा. परंतु तुम्हारा कच्चे विचार है. मैं यहाँ रहता आया हूं और मैं यहीं रहूंगा. मुझे भी यहाँ रहने का उतना ही अधिकार है जितना तुम लोगों को है. यह जगह नहीं छोर सकता. चाहे मुझे कितना भी ाज़यतें मसेबतें क्यों न सहन करनी पड़ी. "
"तुम सच कहते हो!" अचानक जंगल में सैकड़ों आवाज़ें गूंज उठें. "तुम्हें यहाँ रहने का उतना ही अधिकार है जितना और लोगों को है. सचमुच यह एकांत, यह ज़ुल्म व सितम, यह मसेबतें तुम्हें घबरा कर यह जंगल छोड़ने पर मजबूर नहीं कर सकते. हम तुम्हारी तन्हाई बान्टीं हैं. हम तुम्हारी आने वाली मुसीबतों से रक्षा करेंगे. क्योंकि तुम्हारे जाने के बाद हम भी यहां अकेले हो जाएंगे. हम सब मिलकर इस जंगल में रहेंगे और एक दूसरे की तन्हाई दूर करेंगे.
"नहीं यह तुम गलत काम कर रहे हो". अचानक दूसरी सैकड़ों आवाज़ें जंगल में गूंज लगीं. "तुम उसकी मदद नहीं कर सकते. उसे यह जगह छोड़ कर जाना है और हर हाल में जाना है. हम उसे यह जगह छोड़ने के लिएमजबूर कर देंगे या उसके अस्तित्व को ही इस जगह से कर देंगे. यह नापाक अस्तित्व इस पवित्र जगह रहने लायक ही नहीं है ".
"नापाक तुम्हारे विचार हैं. जो दूसरों को नापाक कहते हो". उत्‍तर  हजारों आवाज़ें ाभरें. और फिर दोनों तरफ से आवाज़ें उभरने लगीं. आवाज़ें एक बे हनगम कान के पर्दे फाड़ देने वाले शोर में तब्दील होने लगी. कभी समर्थन में उभरने वाली आवाज़ें सुनकर उसका दिल खुशी से झूम उठता और सारे शरीर में एक नया संकल्प संचार   कर जाता. कभी अपने विरोध में उठने वाली आवाज़ें सुनकर उसका अस्तित्व किसी सूखे पत्ते की तरह लरज़ने लगता. सारा शरीर पसीने से तर हो जाता और अस्तित्व प्रशन   का लावा सा खोलने लगता. वह घबरा कर अपने दोनों कानों पर हाथ रख देता. अचानक उसे महसूस हुआ, पर चारों ओर से तैरों की बारिश हो रही है. वह घबरा गया और अपने हाथों में पकड़िय लकड़ी से ढाल का काम लेकर स्‍वंय  को नीज़ों से तैरों से बचाने की कोशिश करने लगा. परंतु उसे महसूस होने लगा वह अधिक देर तक स्‍वंय  को बचा नहीं पाएगा. तैरों और नीज़ों की संख्या इतनी है कि कभी न कभी तो वह उसके अस्तित्व में पीोस्त होउसकी आत्मा को शरीर की कैद से मुक्त कर देंगे.
इसके लिए अधिक देर तक अपना बचाव करना संभव ही नहीं था. परंतु अचानक उसे लगा एक नज़र न आने वाली शक्ति है जो उसके साथ है और उसका बचाव कर रही है. वरना अब तक तो यह नीज़े और तीर कब के इसे समाप्‍त  कर चुके होते. इस एहसास ने उसके भीतर एक नई आत्मा फूंक दी कि वह अकेले नहीं है. कोई और शक्ति भी उसके साथ है. और एक नए जोश से स्‍वंय  की रक्षा करने लगा.

 
...
अप्रकाशित
मौलिक
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