Wednesday, October 19, 2011

Hindi Short Story Parikarma By M.Mubin


कहानी    परिक्रमा    लेखक  एम मुबीन   
बेल बजाने पर नियम अनुसासर  पत्नी ने ही  दरवाजा खोला. उसने अपनी तेज नज़रें पत्नी के चेहरे पर केंद्रित कर दीं जैसे वह पत्नी के चेहरे से आज पेश आने वाली किसी असामान्य घटना को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो.
पत्नी का चेहरा सपाट था. उसने एक गहरी सांस ली उसे लगा कि जैसे उसके दिल का एक बहुत बड़ा बोझ हल्का हो गया है.
पत्नी के चेहरे का मौन  इस बात की गवाही दे रहा था कि आज ऐसा कोई घटना पेश नहीं आई  जो चिंताजनक हो या उसके मन की उन आशंकाओं को सही साबित कर दे जिनके बारे में वह  रास्ते भर सोचता आया था. इतने दिनों में वह पत्नी के चेहरे की किताब पढ़ना अच्छी तरह सीख गया था, पत्नी के चेहरे के भावों  से अनुमान लगा लेता था कि आज किस तरह की घटना घटी होगी इससे पहले कि पत्नी उस घटना के बारे में उसे बताए वह स्‍वंय  को मनोवैज्ञानिक रूप से नुरी तरह उस घटना को जानने के बाद स्‍वंय  पर होने वाली प्रतिक्रिया के लिए तैयार कर लेता था.
अपना सिर झटककर उसके ने अपनी कमीज उतार कर पत्नी की ओर बढ़ा दी और पत्नी के हाथ से लुंगी लेकर उसे कमर के गिर्द  लपेट कर अपनी पैंट उतारने लगा. फिर वाश बेसिन के पास जाकर उसने ठंडे ठंडे पानी के छीन्‍टे अपने चेहरे पर मारे उन छीटों  के चेहरे से टकराते ही उसके सारे शरीर में ताज़ग़ी  का एक झोंक सा संचार   कर गया. फिर वह धीरे धीरे मुँह हाथ धोने लगा.
तौलिया से मुंह हाथ पोंछ कर  वह अपनी कुर्सी पर आ बैठा और पत्नी से पूछने लगा.
"गुड्डू कहां है?"
"शायद ट्यूशन के लिए गया है." पत्नी ने उत्‍तर  दिया.
"झूठ बोलता है वह" पत्नी की बात सुनते ही वह फट पड़ा. "वह ट्यूशन का बहाना करके इधर उधर आवारागर्दी करता फिरता है, अभी रास्ते में मैं उसे कैप्‍टोल   के पास चार आवारा दोस्तों के साथ देख चुका हूँ, उसकी ट्यूशन क्लास नाज़ के पास है, वह कैप्‍टोल   के पास कैसे पहुंच गया? "
"हो सकता है ट्यूशन जल्दी छूट गई हो और वह दोस्तों के साथ घूमने निकल गया हो." पत्नी ने बेटे का पक्ष लिया .
"यदि ट्यूशन क्लास से जल्दी छुट्टी हो गई तो उसे घर आना चाहिए था, दोस्तों के साथ आवारागर्दी के लिए जाना नहीं चाहिए था, मैं तो कहता हूं कि उसकी ट्यूशन सरासर धोखाधड़ी है, ट्यूशन के बहाने वह आवारागर्दी करता है और ट्यूशन शुल्क दोस्तों के साथ उड़ा देता है. "
"अगर बेटे पर भरोसा नहीं है तो स्‍वंय  किसी दिन ट्यूशन क्लास में जाकर पता क्यों नहीं लगा लेते?" पत्नी ने तेज स्वर में कहा तो उसने विषय बदला.
"मुन्‍नी   कहां है.?"
"अपनी एक सहेली के साथ शॉपिंग के लिए गई है."
"इस लड़की का बाहर निकलना अब कम कर दो. अब वह छोटी बच्ची नहीं रही, बड़ी हो गई है. सवेरे जब मैं ड्यूटी पर जा रहा था तो वह खिड़की में खड़ी ब्रश कर रही थी और नीचे दो तीन लड़के उसे देख कर मुस्कुरा रहे थे , भदे टिप्पणी पास कर रहे थे. यह मुहल्ला शरीफों के रहने के योग्य ही नहीं...... "वह बड़बड़ाने लगा.
"चलो खाना खा लो." पत्नी ने उसका मूड बदलने के लिए विषय बदलने की कोशिश की.
"अरे हां छोटा कहां है दिखाई नहीं दे रहा है."
"अपने दोस्तों के साथ खेलने गया है."
"कहाँ खेलने गया होगा?" वह झुंझला कर बोला. "बच्चों के खेलने के लायक कोई जगह भी तो नहीं बची है, चारों ओर कांक्रेट  का जंगल आबाद हो गया है. तुम्हें पता है कि वह अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने आजाद मैदान जाता है.? "
"रात के आठ बज रहे हैं, आजाद मैदान में सात बजे अंधेरा हो जाता है क्या वह अब तक फल्ड लाइट में क्रिकेट खेल रहा होगा.?"
"देखो तुम बच्चों को आने जाने के लिए बस या टैक्सी का किराया नहीं देते हो तो ज़ाहिर सी बात है कि आजाद मैदान से पैदल ही आ रहा होगा और आजाद मैदान कोई इतने पास नहीं है कि पांच दस मिनट में कोई घर आजाए. "
"सुलताना  मैं तुम से बार बार कहता हूँ कि मैं जब घर आउं तो मुझे बच्चे घर में दिखाई देने चाहिए परंतु तुम मेरी इस बात को गंभीरता से लेती ही नहीं, अंत तुम्हारे मन में क्या है, तुम क्या चाहती हो?"
"देखो! तुम अगर बच्चों के बाप हो तो मैं भी बच्चों की माँ हूँ, तुम से अधिक मुझे बच्चों की चिंता रहती है मुझे पता है इस शहर और हमारे आसपास का वातावरण इस योग्य नहीं है कि बच्चे ज़्यादा देर घर से बाहर रहने पर भी सुरक्षित रहें परंतु क्या करूँ बच्चे कोई न कोई ऐसा काम बता देते हैं कि विवश मुझे उन्हें बाहर जाने की अनुमति देनी ही पड़ती है. "पत्नी ने उत्‍तर  दिया." अब यह बेकार की बातें छोड़ो और खाना खालो , पता नहीं दोपहर में कब खाना खाया है? "
"ठीक है निकालो." उसने भी हथियार डाल दिए.
वह यूं तो   इत्मीनान से खाना खा रहा था परंतु उसका सारा ध्यान बच्चों में लगा हुआ था. यह गुड्डू अपने दोस्तों के साथ इतनी देर तक पता नहीं क्या क्या करता फिरता है मुन्‍नी   अपनी सहेली के साथ शॉपिंग करने गई है अभी तक वापस क्यों नहीं आई ? उसे इतनी रात तक घर से बाहर नहीं रहना चाहिए और छोटे को क्रिकेट का जुनून सा है अब क्रिकेट खेलने के लिए दो तीन किलोमीटर दूर आजाद मैदान में और वह भी पैदल जाने में कोई तुक है?
जब वह घर से बाहर ड्यूटी पर होता था तो भी एक क्षण के लिए घर और बच्चों का ध्यान उसके मन से अलग नहीं हो पाता था. घर आने के बाद भी उसे इस यातना से मुक्ति नहीं मिल पाती थी. अगर बच्चे घर में उसकी  नज़रों के सामने भी होते तो वह उन्हीं के बारे में सोचा करता था.
गुड्डू पढ़ने लिखने में काफी अच्छा है, काफी बुद्धिमान है. बारहवीं पास कर ले तो कोई अच्छी लाइन में डाला जा सकता है, डॉक्टर बनाने की ताकत  तो नहीं है, हाँ किसी पोलीटेकनिक में भी प्रवेश मिल जाए तो उसे पढ़ा सकता है. मुन्‍नी   शिक्षा का सिलसिला समाप्‍त  कर देना उसकी ईच्‍छा के ख़िलाफ़ था परंतु इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं था, तीसरी बार मैट्रिक में फेल हुई थी पढ़ने लिखने में यूं ही है. हां सुंदरता में मां से बढ़कर है उसकी विवाह  की उम्र है, वह जल्द से जल्द उसका विवाह  कर के एक बड़े कर्तव्य से  निवृत्त होना चाहता है परंतु क्या करें मुन्‍नी   के लिए कोई अच्छा लड़का मिलता ही नहीं. एक दो रिश्ते आए भी परंतु न तो वह मुन्‍नी   की गुणवत्ता के थे न बराबरी के लिए उसने इन्‍कार कर दिया.
छोटा पढ़ने में तेज था परंतु क्रिकेट... उफ! यह क्रिकेट उसे बर्बाद करके रख देगा. जहां तक सुलताना का प्रशन   था दिन भर घर के काम स्‍वंय  अकेली करती थी. घर के सारे काम, बच्चों के काम के बाद एम्‍ब्रायडरी मशीन पर बैठ जाती थी तो कभी कभी रात के दो बज जाते थे.
वह उसे समझाता था. उसे दो बजे रात तक आंखें फोड की जरूरत नहीं है. वह इतना कमा लेता है कि उनका गुज़र हो जाए परंतु वह भड़क कर उत्‍तर  देती.
"तुम्हारी बुद्धि पर तो पर्दा पड़ा हुआ है. अगर मैं थोड़ी मेहनत कर दो पैसे कमा लेती हूँ तो इसमें बुराई क्या है? घर में जवान बेटी है, उसके लिए पैसे जमा कर रही हूँ. बेटी के विवाह  को मामूली काम मत समझो विवाह  तो एक ऐसा काज है जिसके लिए समुद्र के पानी जैसा सामान भी कम पड़े. "
ऑफिस में काम करते हुए वे सबसे अधिक सुलताना  के बारे में सोचता था. घर में अकेली होगी उसने दरवाजा तो बंद कर रखा है...... या फिर किसी अजनबी की दस्तक पर दरवाज़ा खोल कर संकट में फंस जाए है.
एक दिन पुलिस एक अपराधी का पीछा करती उनके मुहल्ले तक आ गई थी. दोषी शरण लेने के लिए उनकी बिल्डिंग में घुस गया. उसने उनके घर पर दस्तक दी और बेख़याली में सुलताना ने दरवाजा खोल दिया. उस अपराधी ने तुरंत चाकू निकाल कर उसके कंठ पर रख दिया और उसे धमकाते घर में घुस गया.
"खामोश! अगर मुंह से ज़रा  सी आवाज़ भी निकली तो गला कट जाएगा."
वह बहुत देर तक सुलताना  का मुंह दबाए उसके गले पर चाकू लगाए घर में छुपा रहा था. पुलिस सारी बिल्डिंग में उसे ढूंढ रही थी. सुलताना  एक दो बार मचली तो तेज चाकू उसके शरीर से लग गया और शरीर पर एक दो जगह घाव हो गए जिनमें से खून बहने लगा. बाद में जब उस बदमाश को लगा कि पुलिस जा  चुकी है तो वह सुलताना  को छोड़कर भागा. उसी समय सुलताना  ने चीखना शुरू कर दिया...... सुलताना  की चीखें सुनकर नीचे से गुजरते पुलिस वाले चौकन्ना हो गए और उन्होंने इस बदमाश को गोली का निशाना बना दिया.
बाद में पुलिस को पता चला कि बदमाश उनके घर में छुपा हुआ था तो उन्होंने पंचनामे  में सुलताना  का नाम भी दर्ज कर लिया सुलताना  के साथ इसे कई बार पुलिस स्टेशन के चक्कर काटने पड़े. पुलिस उल्टे सीधे प्रश्न करती.
"वह बदमाश घर में घुसा तो आप चीख़ी क्यों नहीं? वह बदमाश तुम्हारे ही घर में क्यों घुसा क्या तुम लोग पहले से जानते हो? उस बदमाश ने तुम्हारे साथ
क्‍या किया ? यह शरीर पर घाव कैसे आए तुमने प्रतिरोध क्यों नहीं किया? ‘’
तब से रोज़ाना  आशंका लगी रहती थी कि आज भी फिर उसी तरह की कोई वारदात न हो जाए.
एक बार मुहल्ले में पुलिस का दिन दहाड़े किसी गिरोह से एनकाउंटर हो गया. दोनों तरफ से गोलियां चल रही थीं. लोग भयभीत होकर इधर उधर भाग रहे थे. उस समय छोटा स्कूल से आया बेख़याली में वह उस क्षेत्र में प्रवेश कर गया जहां मुठभेड़ चल रही थी इससे पहले कि स्थिति का उसे ज्ञान होता और वह वहां से किसी सुरक्षित स्थान की ओर भागता एक गोली उसके बाजू को चीरती हुई गुजर गई.
रक्त लहू लुहाण हो वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा. मुठभेड़ ख़त्म हुआ तो किसी की नज़र उस पर पड़ी और इसी ने उन्हें ख़बर की और उसे अस्पताल ले जाया गया.
गोली मांस को चीरती हुई लगी थी, शुक्र था हड्डियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था, फिर भी वह दस दिनों तक अस्पताल में रहा और बाजू में घाव भरने में पूरा एक महीना लग गया.
छोटा अच्छा हो गया था परंतु इतना कमज़ोर और पतला हो गया था कि पूरे एक साल तक उसकी पुराना स्वास्थ्य वापस न आ सका.
एक दिन तरकारियां खरीद कर वापस आती मुन्‍नी   को किसी गुंडे ने छेड़ दिया तब गुड्डू स्कूल से वापस आ रहा था, उससे सहन  नहीं हुआ और वह गुंडे से उलझ पड़ा.
गुड्डू भला उ स गुंडे का मुकाबला किया करता गुंडे ने उसे घायल कर दिया कुछ लोग उसकी मदद को बढ़े तो गुंडा भाग खड़ा हुआ परंतु गुड्डू घायल हो गया था.
इसके बाद पता नहीं क्या बात उसके मन में बैठ गई कि उसने मोहल्ले के आवारा बदमाश लड़कों से दोस्ती कर ली और स्कूल से आने के बाद वह अधिकांश उन्हीं के साथ रहने लगा. एक दो बार के समझाने पर वह उससे भी उलझ पड़ा.
"अब्बा! आज के ज़माने में अपनी और अपने परिवार की रक्षा के लिए ऐसे लोगों के साथ रहकर उनकी मदद लेना बहुत जरूरी है. सज्जनता, गुंडे और बदमाशों से हमारी रक्षा नहीं कर सकती."
पिछले कुछ सालों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई थी कि वह एक तरह से टूट सा गया था. गुड्डू रात को देर से घर आता था. देर रात तक वह आवारा बदमाश किस्म के लड़कों के साथ रहता था. वह उसे रोकता तो वह उलझ पड़ता. ..... केवल संतोष की बात यह थी कि वह स्कूल नियमित रूप से जाता था और पढ़ाई में भी पहले की तरह रूचि लेता था.
मुन्‍नी   को आवारा बदमाश लड़के उसके सामने छेड़ने, वाक्य कसते थे. सुलताना  भी दबे शब्दों में कई बार इस बारे में उससे कह चुकी थी जब वह अपने पड़ोसियों से अपने घर का मुकाबला करता तो उसे कुछ महसूस होता था कि उसके बच्चे पड़ोसियों की तुलना कहीं ज्यादा सीधी राह पर हैं.
पड़ोसियों के बच्चों का बुरा हाल था. कई अच्छे लड़के शिक्षा छोड़कर बुरी संगत  में पड़ने के कारण ग़लत रास्‍तों  पर चल निकले थे. गली में कहीं चोरी छिपे नशा  वर सामग्री बकती थीं कई बच्चे नशीली वस्तु के आदी बन चुके थे. कम उम्र में ही कुछ लड़के वेश्‍याओं के बंदी  बनकर जीवन और जवानियां बर्बाद कर रहे थे. गुंडागर्दी  के ग्लैमर ने कई लड़कों को फांस लिया था और वह नैतिकता के सारे शिक्षण भूलकर भैतिकवाद  का शिकार हो गए थे.
लड़कियों की एक अजीब ही दुनिया थी. ज़्यादातर लड़कियाँ ग्लैमर का शिकार थीं और ग्लैमर को प्राप्त करने के लिए भटक चुकी थीं भटकने में भी उन्हें कोई लज्जा नहीं महसूस होती थी. जैसे नैतिकता, मूल्यों एक कहानी पुरानी  हो.
जब वह अपने वातावरण पर नज़र डालता तो कभी कभी यह सोच कर कांप उठता था वह और उसके बच्चे भी उसी वातावरण में रह रहे हैं. उसके बच्चे भी कभी भी इस वातावरण के बंदी  बनकर इन बुराइयों का शिकार बन सकते हैं. जब कभी कल्पना में इस बारे में सोचता तो उसे अपने सारे सपने टूट कर बिखरते  महसूस होते थे. इस सिलसिले में सुलताना  भी उसकी तरह चिंतित थी और वह अक्सर उससे दबे शब्दों में कहा करती थी.
"सलीम ! भगवान का शुक्र है हमारे बच्चे आज तक इस गंदे वातावरण से बच्चे हुए हैं परंतु डरती हूं अगर इस वातावरण ने उन्हें भी अपनी चपेट में ले लिया तो? इसका क्या इलाज हो सकता है?"
"एक ही इलाज है, हम यह जगह छोड़ दें."
"कहाँ जाएंगे? हमें इस शहर में तो सर छिपाने के लिए कोई जगह मिलने से रही हमारे पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि हम कहीं दूर कोई जगह ले सकें."
"कहीं भी चलो. चाहे वह जगह जहां ऐसा वातावरण न हो शहर से पचास किलोमीटर दूर हो, मुझे कोई शिकायत नहीं होगी परंतु अपने बच्चों की भलाई के लिए अब यह प्रस्‍थान  जरूरी  हो गई है. समस्या तुम्हारी नौकरी का है तुम्हें आने जाने में थोड़ी तकलीफ़ तो होगी परंतु क्या अपने बच्चों की भलाई के लिए तुम इतनी तकलीफ़ नहीं उठा सकते? "
"मैं अपने बच्चों की भलाई के लिए हर कष्‍ट  उठा सकता हूँ."
"फिर कुछ सोचो, इस वातावरण से निकलने के लिए कोई कदम उठाव." पत्नी ने कहा.
"हाँ ज़रूर कोई कदम उठाना जरूरी  है." उसने उत्‍तर  में कहा और सोच में डूब गया.
एक दिन वह आया तो बहुत खुश था. आते ही सुलताना  से कहने लगा. "सुलताना ! अपने बच्चों की भलाई के लिए हमें जो क़दम उठाना चाहिए था इस राह में पहला कदम रख लिया है, मैंने एक जगह फ्लैट बुक किया है वह जगह यहाँ से पचास किलोमीटर दूर है परंतु वहां पर   यहां सी गंदगी नहीं होगी. "यह कहते हुए वह सुलताना  को सारी बात समझाने लगा.
बहुत बड़ी कालोनी बन रही है मामूली राशि पर वहां फ्लैट बुक हो गया है. पैसे किश्तों में अदा करने हैं अब पूरी कॉलोनी तैयार होने में दो साल लगेंगे. तब तक हम पैसे अदा कर देंगे या जो बाकी पैसे होंगे इस कमरे को बेच कर का अदा कर देंगे.
दोनों की आंखों के सामने एक सुंदर बस्‍ती  का सपना था. खूबसूरत इमारतें, चारों ओर फैली हरियाली, मस्जिद, मदरसा, बाग, स्कूल, विशाल साफ सड़कें और खुली खुली जलवायु जिनमें घुटन का नाम व निशान नहीं.
उन्होंने बच्चों को भी उस बस्ती के बारे में बताया था. बच्चों ने उनके इस सपने के बारे में अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं व्‍यक्‍त की  थी.
एक दो बार सुलताना  ने दबे शब्दों में कहा भी था.
"बच्चे यहां पैदा हुए पले  बढ़े हैं. उन्हें इस जगह से माहब्‍बत सी हो गई है संभव है वह यहां से जाने से इन्‍कार कर दें. आखिर उनके दोस्त मित्र  तो यहां रहते हैं."
"बच्चों को हर हाल में यहां से जाना होगा. आखिर यह सब हम अपनी खुशी के लिए नहीं उनकी भलाई के लिए कर रहे हैं."
उन दिनों वह जिस यातना का शिकार था. उसके ऑफिस में काम करने वाला अकबर भी दो साल पहले इसी यातना के दौर से गुज़र रहा था. अकबर का भी वही समस्या थी जो उसकी समस्या थी. अकबर ने भी वही हल और रास्ता निकाला था जो उसने निकाला था.
कुछ दिनों पहले वह भी शहर से दूर नई बसने वाली बस्ती में जा बसा था. जगह बसने के बाद वह बहुत खुश था.
"सलीम भाई सारी चिंताओं और आशंकाओं से मुक्ति मिल गई है. समझ लीजिए अब बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो गया है."
उसके मन में बार बार अकबर की वह बात गूंजती थी. जब भी वह अकबर की इस बात के बारे में सोचता था. यह सोच कर अपना दिल बहलाता था कि एक साल बाद तो उसे भी अकबर की तरह एक नई बसने वाली बस्ती में बसना है. एक साल बाद उसके होंठों पर भी वही शब्द होंगे. बस एक साल नरक में बिता कर स्‍वंय  को नरक से सुरक्षित रखना है.
दिन गुजर रहे थे. और अच्छे दिन समीप  आ रहे थे. उस स्थान से प्रवास के दिन जैसे समीप  आ रहे थे वैसे वैसे बच्चों, घर, पत्नी के बारे में उसकी चिन्‍ता  ज्यादा ही बढ़ती जा रही थीं वह उनके बारे में कुछ ज़्यादा ही सोचने लगा था.
उस दिन ऑफिस कैन्‍टिन  में अकबर के साथ लंच लेते हुए उसने अकबर को चिंतित पाया तो पूछ बैठा.
"क्या बात है अकबर बहुत परेशान लग रहे हो?"
"क्या बताऊँ सलीम भाई! सारी प्रयत्‍न  और योजना गलत साबित हो गए हैं."
"क्या बात है तुम्हें किस बात की चिंता है?"
"जिन बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए नगर से दूर रहने का सोचा था  वहां जाने के बाद भी बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सका है. यहाँ के वातावरण से वे बच गए तो वहां पर एक नए और अजीब वातावरण में रम रहे हैं, ऊंचे सपना, ऊँची सोसायटी के आदतों व  , उसी सोसाइटी में ढलने  की कोशिश. बिना यह जाने कि हमारी उस सोसाइटी के तौर तरीक़ों में ढल कर रहने की हैसियत नहीं है. उपभोक्ता संस्कृति उन पर हावी हो रहा है, सैटेलाईट  संस्कृति और उसके द्वारा फैलने वाले विचारों के वे शिष्‍य  बन रहे हैं, मादक पदार्थ लेने की लत उनमें बढ़ती जारी है, मूल्यों का उनमें अभाव हो रहा है, पहले वे विचारों में ढलने  वाले थे वह विचारों मुझे पसंद नहीं थे, इसलिए उन्हें इस जगह से दूर ले गया परंतु वहां वे ऐसे विचारों में ढल रहे हैं जो मुझे भी पसंद नहीं है. "
वह अकबर की बात सुनकर सन्नाटे में आ गया.
एक साल बाद उसे भी तो वहां जाना है. अगर वहां उसके साथ भी ऐसा हुआ तो इस प्रस्‍थान  का क्या लाभ?
उसे लगा जैसे वह एक वर्तुल में  परिक्रमा  कर रहा है. किसी नापसंद स्थान से वह चाहे कितनी दूर भी जाना चाहे परंतु लौट कर उसी जगह आना है.
 
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल  09322338918

Saturday, October 8, 2011

Hindi Short Story Hirni By M.Mubin

कहानी हिरनी लेखक एम. मुबीन
जब वह घर से निकली तो 9 बज रहे थे । तेज लेकल ट्रेन तो मिलने से रही, धीमी लेकल से ही जाना पडेगा । वह भी समय पर मिल गई तो ठीक! वरना यह तय है कि आज फिर वह देरी से आफिस पहुंचेगी और आफिस लेट पहुंचने का आर्थ ?
इस विचार से ही उसके मथे पर बल पड गए और भावें तन गई, आखों के सामने बास का चेहरा घूम गया और कानों में उसकी गरजदार आवाज गूंजने लगी ।
‘‘मिसेज महात्रे आप आज फिर लेट आई है ? मेरे बार बार कहने पर भी आप लेट आती है आपकी इस ढिटाई पर मुझे गुस्सा आता है । आपको शर्म आनी चाहिए बार बार ताकीद करने पर भी आप वही हरकत करती है । आज के बाद मैं आपके साथ कोई भी रियायत नहीं बरतूंगा ?’’
कोई उससे टकराया और उसके विचारों की ढ़ाॄंखल फ्रांग हो गई ।
वह सडक पर थी भी और यातायात भारी सडक उसे पार करनी थी इसलिए होश में रहना बहुत जरूरी था । मस्तिष्‍क कहीं और हो, मन कहीं और ऐसे में सडक पार करने का आर्थ किसी दुर्घटना को निमंत्रण देना जो उससे टकराया वह तो हीं दूर चल गया । उसके उससे इस तरह टकराने परभी उसे उस टकराने वाले पर कोई क्रोधनहीं आया । अच्‍छा हुआ वह उससे टकरा गया उसके विचारों की ढ़ाॄंखल तो टूटी और वह होश की दुनिया में वापस आ गई वरना तनाव में वह इन्ड़ाीं विचारों में खोई रहती और उसी आवस्था में सडक पार करने का प्रयत्न करती औऱ किसी दुर्घटना का शिकार हो जाती ।
उसने चारों ओर चौकन्ना होकर देखा सडक की ओर गाडियाँ इतनी दूर थी कि वह आसानी से सड़क पार कर सकती थी । सिग्नल तक रूकने का आर्थ था स्वयं को और दो चार मिनट लेट करना । इस विचार के मस्तिष्‍क में आते ही उसने सडक पार करने का निर्णय कर लिया और दौडती हुई सडक की दूसरी ओर पहुंच गई । दोनों ओरसे आने वाली गाडियां उसके कापकी समीप हो गई थी । जरा सी देरी या सुस्‍ती दुर्घटना का कारण बन सकती थी । परंतु इसके लिए उसने अपने आपको पूरी तरह तैयार कर लिया था कोई दुर्घटना हो इस बात का पूरा ध्यान रखा था । सडक पार करके उसने उस तंग सी गली में प्रवेश किया जिसे पार करने के बाद रेलवे स्टेशन की सीम आरंभा होती थी । गली में कदम रखते ही उसके दिल की घडकने तेज हो गई, सांसे फूलने लगीं और मथे पर पसीीने की बूंदे उभर आई ।
उसने हाथ के रूमल से मथे पर आई पसीने की बूंदे सापक कीं और फूली हुई सांसों पर नियंत्रण पाने का प्रयत्न करने लगी । परंतु उसे पता था ना तो वह फूली हुई सांसों पर नियंत्रण पा सकेगी ना दिल के धडकने की गाति सामन्य कर सकेगी ।
मस्तिष्‍क में क्राोटा का विचार जो आ गया था । उसे पूरा विश्वास था गली के बीच उस पान की दुकान के पास वह कुर्साी लगाकर बैठा होगा उसे आता देक्रा भाद्दे आंदाज मे वाक़्य उछाल गा । क्राोटा की यह दिनचर्या थी । सुबह शाम वह उसी जगह उसकी राह देक्राता था । उसे पता था सवेरे वह कब आफिस जाती है और शाम को कब आफिस से घर लौटती है । उसके आने जाने का और रेलवे स्टेशन से घर के लिए आने का दूसरा कोई रास्ता नहीं था ।
एक और रास्ता है परंतु वह इतना लंबा रास्ता है कि उस रास्ते से जाने की कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता है । इसालिए क्राोटा उसी रास्ते पर बैठा उसकी राह देक्राता रहता है और उसे देक्राते ही कोई भाद्दा सा वाक़्य हवा में उछालता है ‘‘हाय डार्लींग ! बहुत अच्‍छी लग रही हो, यह आफिस, नौकरी वोकरी छोडो मुझे क्राुश किया करो..... हर महीने इतने पैसे दिया करूंगा जो नौकरी से तीनचार महिनों मे भी नहीं मिलते ड़ोंगे । आओ आज किसी होटल में चलते है आज शेरेटान होटल में पहल ही से अपना एक कमरा बुक है । नौकरी करते हुए जिंदगी भर शेरेटान होटल का दरवाजा भी नहीं देख पाओगी । आज हमरे साथ उसमें दिन गुजार कर देख ले ।’’
खोटा के हर वाक़्य के साथ उसे अनुभव होता एक भाल आकर उसके मन में चुभा गया है । दिल की धडकनें तेज हो जाती थीं और आंखो के सामने आंधकार सा छाने लगता था । तेज चलने के प्रयत्न में कदम लडखडाने लगते थे परंतु वह पूरी शाएिक़्त लगाकर तेज तेज चलने का प्रयत्न करते खोटा की आखों से ओझल हो जाने का प्रयत्न करती थी ।
खोटा उस क्षेत्र का मना हुआ गुंडा था उसे क्षेत्र का बच्चा बच्चा उससे पारिचित था शराब, जुए, वेश्याओं के आड्डे चलना, हपक़्ता वसूली, सुपारी, आगवा, हत्या, मरपीट इत्या. हर तरह के काम वह करता था । इस प्रकार के कामें में ऐसा कोई काम नहीं था जो वह ना करता था ।
जो चाहता था कर जाता था । कभी पुलिस की गिरपक़्त में नहीं आता था । यदि किसी ममले में फंस भी गया तो उसकी पहुंच, प्रभाव के कारण पुलिस को उसे दो दिनों मे ही छोडना पडता था ।
उस खोटा का दिल उस पर आ गया था । उस पर ! उस मया महात्रे पर, एक छोटे से निजी आफिस में छोटा सा काम करने वाली, एक बच्चे की मं पर ।
पहले तो खोटा उसे सिर्फ घूरा करता था । फिर जब उसे उसके आने जाने का समय और रास्ता मलूम हो गया तो वह प्राति दिन उसे उस रास्ते पर मिलने लगा । रोज उसे देखकर मुस्काता और उस पर गंदे वाक़्य कसता । खोटा की इन हरकतों से वह आतंकित सी हो गई थी । उसे यह आनुमन तो हो गया था खोटा के मन में क़्या है और उसे पूरा विश्वास था जो खोटा के मन में है खोटा उसे एक दिन जरूर पूरा करेगा ।
इस कल्‍पना से ही वह कांप उठती थी । यदि खोटा ने अपने मन की बात पूरी कर डाली, या पूरी करने का प्रयत्न किया तो ? इस कल्‍पना से ही उसकी जान निकल जाती थी ।
‘‘नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता.... यदि खोटा मे मेरे साथ ऐसा कुछ किया तो मैं किसी को मुंह दिखाने के योग्य नहीं रहूंगी ....’’
उसे इस बात का पता था वह इतनी सुंदर है कि खोटा जैसे लेग उसे देखकर बहक सकते है । दूसरे हजार लेग उसे देखकर ऐसा कोई विचार अपने मन में लते तो उसे कोई परवाह नहीं होती क़्योंकि उसे विश्वास था वे कभी भी अपने उस ऐसे वैसे विचार को पूरा करने का साहस नहीं कर सकते थे ।
परंतु खोटा ! हे भागवान ! जो सोच ले दुनिया की कोई भी शाएिक़्त उसे अपने सोचे हुए काम से रोकने का प्रयत्न नहीं कर सकती थी । वह आते जाते खोटा की कल्‍पना से आतंकित रहती थी और उस दिन तो खोटा ने सारी सीमए तोड डाली थी । ना केवल उसके रास्ता रोक कर खडा हो गया था बालिक उसकी कलई भी पकड ली थी ।
‘‘बहुत आकडती हो, अपने आपको क़्या समझती हो ? तुम्‍हें पता नहीं तुमहारा पाल खोटा से पडा है । ऐसी आकड निकालूंगा कि जिंदगी भर याद रखोगी । सारी आकड भूल जाओगी ।’’
‘‘छोडो मुझे’’ उसकी आखों में भाय से आंसू आ गए और वह खोटा के हाथों से अपनी कलई छुडाने का प्रयत्न करने लगी । परंतु वह किसी शेर के चंगुल में फंसी हिरनी सी स्वयं को अनुभव कर रही थी ।
खोटा भायानक आंदाज में हंस रहा था और वह उसके हाथों से अपनी कलई छुडाने का प्रयत्न करती रही ।
इस दृश्य को देखकर एक दो रास्ता चलने वाले राही भी रूक गए । परंतु खोटा पर नजर पडते ही वे तेजी से आगे बढ गए ।
दानवी हंसी हंसता हुआ खोटा, उसकी विवशता से आनंदित हो रहा था । फिर हंसते हुए उसने धीरे से उसका हाथ छोड दिया ।
वह रोती हुई आगे बढ गई ।
खोटा का दानवी आट्टाहास उसकी पीछा करता रहा । वह रोती हुई स्टेशन आई और लेकल ट्रेन में बैफ़्कर सिसकती रही ।
उसे रोता देखकर आसपास के यात्री उसे आश्चर्य से देख रहे थे ।
आफिस पहुंचने तक रो रोकर उसकी आंखे सूूझ गई थी । उसमे आया पारिवर्तन आफिस वालों से छिप ना सका ।
उसे आफिस की सड़ेलियों ने घेर लिया
‘‘क़्या बात है मया ? यह तुमहारा चेहरा क़्यों सूझा हुआ है ? आंखे क़्यों लल है ?’’
उसने कोई उत्तर नहीं दिया और उनसे लिपटकर दहाडे मर मरकर रोने लगी ।
वह सब भी घबरा गई और उसे सांत्वना देते हुए चुप कराने का प्रयत्न करने लगी । बडी मुश्किल से उसके आंसू रूके और उसने पूरी कहानी उन्‍हे सुना दी ।
इससे पूर्व भी वह कई बार उन्‍हे खोटा की हरकतों के बारे में बता चुकी थी । परंतु उन्‍हों इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया था ।
‘‘नौकरी करने वाली स्त्रियों के साथ तो यह सब होता ही रहता है ! मेरा स्वयं एक प्रेमी है जो अंधेरी से चर्नाी रोड तक मेरा पीछा करता है ।’’
‘‘मेरे भी एक आशिक साहब है, सवेरे शाम मेरे मेहलले के नुक़्कड पर मेरा इंतेजार करते रहते है ।’’
‘‘और मेरे आशिक साहब तो आफिस के गिर्द मंडलते रहते है.. आओं बताती हूं सडक पर खडे टिकाटिकती लगाए देख रहे ड़ोंगे ’’
‘‘आगर खोटा तुम पर आशिक हो गया है तो यह, यह कोई चिन्ता की बात नहीं है, तुम चीज ही ऐसी हो कि तुम्‍हारे तो सौ दो सौ प्रेमी हो सकते है।’’
उनकी बातें सुनकर वह झूंझल जाती ।
‘‘तुम लेगों को मजाक सूझा है और मेरी जान पर बनी है । खोटा एक गुंडा है, बदमश है । वह ऐसा सबुकछ कर सकता है जिसकी कल्‍पना भी तुम्‍हारे प्रेमी लेग कर नहीं सकते है ।’’
परंतु उस दिन की खोटा की यह हरकत सुनकर सब सन्नाटे मे आ गई थी ।
‘‘क़्या तुमने इस बारे में अपने पाति को बताया है ?’’
‘‘नहीं आजतक कुछ नहीं बताया है । सोचती थी कोई हंगाम ना खडा हो जाए ।’’
‘‘तो अब पहली फुर्रसत में उसे सबुकछ बता दो ।’’
उस शाम वह नित्य के रास्ते से नहीं, लांबे रास्ते से घर गई और विनोद को सबुकछ बता दिया कि खोटा इतने दिनों से उसके साथ क़्या कर रहा था और आज उसने उसके साथ क़्या हरकत की ।
उसकी बातें सुनकर विनोद का चेहरा तन गया ।
‘‘ठीक है ! फिलहाल तो तुम एक दो दिन आफिस मत जाओ । उसके बाद सोचेंगे क़्या करना है ।’’
उसके बाद वह तीन दिन आफिस नहीं गई ।
एक दिन वह बालकनी में खडी थी आचानक उसकी नजर नीचे गई और उसका दिल धक से रह गया । खोटा नीचे खडा उसकी बालकनी को घूर रहा था । उससे नजर मिलते ही वह दानवी आंदाज में मुस्काने लगा और वह तेजी से भीतर आ गई ।
रात विनोद घर आया तो उसने आज की घटना बताई उस घटना को सुनकर विनोद ने अपने होठ फ्रोंच लिए । दूसरे दिने आफिस जाना बहुत जरूरी था। इतने दिनों तक वह सूचना दिए बिना आफिस से गैर हाजिर नहीं रह सकती थी ।
‘‘आज मैं तुमको स्टेशन तक छोडने आऊंगा ।’’ विनोद ने कहा तो उसकी हिममत बंधी ।
विनोद उसे स्टेशन तक छोडने आया । जब वह गली से गुजरे तो पान स्टाल के पास खोटा मौजूद था ।
‘‘क़्यों जाने मन ! आज बाडी गार्ड साथ लई हो, तुम्‍हें अच्‍छी तरह मलूम है कि इस तरह के सौ बाडी गार्ड मेरा कुछ नहीं बिगाड सकते ।’’
पीछे से आवाज आई तो उस आवाज को सुनकर क्रोधमें विनोद मुडा परंतु उसने उसे थाम लिया ।
‘‘नहीं विनोद, यह गुंडो से उलझने का समय नहीं है’’ और वह विनोद को लगभाग खेंचती स्टेशन की ओर बढ गई ।
फिर शाम वापसी के लिए उसने लांबा रास्ता अपनाया परंतु उसकी कालेनी के गेट के पास पहुंचते ही उसका मन धक से रह गया ।
खोटा गेट पर उसकी राह देख रहा था ।
‘‘मुझे आनुमन था कि तुम वापस उस रास्ते से नहीं आओगी । इसलिए तुमहारी कालेनी के गेटपर तुम्‍हें सलाम करने आया हूं । काश तुम मुझसे पकरार हासिल कर सको ।’’
यह कहता हुए खोटा उसे सलाम करता आगे बढ गया ।
रात विनोद को उसने सारी कहानी सुनाई तो विनोद बोल
‘‘कल यदि खोटा ने तुम्‍हें छेडा तो हम उसके विरूद्ध पुलिस में शिकायत करेंगे ।’’
दूसरे दिन विनोद उसे छोडने के लिए आया तो खोटा से फिर आमना सामना हो गया । खोटा की गंदी बाते विनोद सहन नहीं कर सका और उससे उलझ गया ।
विनोद ने एक मुक़्का खोटा को मरा, उत्तर में खोटना ने विनोद के मुंह पर ऐसा वार किया कि उसके मुंह से खून बहने लगा ।
‘‘बाबू । खोटा से आच्छे आच्छे तीस मरखा नहीं जीत सके तो तुमहारी हैसीयत ही क़्या है ।’’
घायल विनोद ने आफिस जाने के बजाए पुलिस स्टेशन जाकर खोटा के विरूद्ध शिकायत करना जरूरी समझा ।
थाना प्रमुख ने सारी बातें सुनकर कहा
‘‘ठीक है हम आपकी शिकायत लिख लेते है, परंतु हम खोटा के विरूद्ध ना तो कोई सख्त कार्यवाही कर पाएंगे और ना कोई मजबूत केस बना पाएंगे । क़्योंकि कुछ घंटो में खोटा छूट जाएगा और संभाव है छूटने के बाद खोटा तुमसे इस बात का बदल भी ले । वैसे आप डारिए नहीं हम खोटा को उसके किए की सजा जरूर देंगे ।’’ पुलिस स्टेशन से भी उन्‍हे निराशा ही मिली ।
उस दिन दोनों आफिस नहीं गए ।
तनाव में बिना एक दूसरे से बात किए घर में ही टहलते रहें ।
शाम को उसने पुलिस स्टेशन पकोन लगाकर अपनी शिकायत पर की जानेवाली कार्यवाही के बारे में पूछा
‘‘मिस्टर विनोद, थाना प्रमुख ने कहा, आपकी शिकायत पर हमने खोटा को स्टेशन बुलकर ताकीत दी है यदि उसने दोबारा आपकी पत्‍नी को छेडा, आपसे उलझने की कोशिश की तो उसे आंदर डाल देंगे ।’’
दूसरे दिन दोनों साथ आफिस जाने के लिए निकले, उस स्थान पर फिर खोटा से सामना हो गया जहा नित्य होता था ।
‘‘वाह बाबू वा ! तेरी तो बड़ूत पहुंच है । खोटा से भी ज्यादा, तेरी एक शिकायत पर पुलिस ने खोटा को बुलकर ताकीद की, और सिर्फ ताकीद की है ना, अब की बार खोटा ऐसा कुछ करेगा कि पुलिस को तुमहारी शिकायत पर खोटा के विरूद्ध कार्यवाही करनी पडेगी ...’’
‘‘खोटा हम शरीपक लेग है । हमरी इज्जत हमें अपनी जान से ज्यादा प्यारी है और उस इज्जत की रश के लिए हम अपनी प्राण दे भी सकते है ! इसीलिए भालई इसी मे है कि तुम हम शरीपक लेगों को परेशान मत करो । तुम्‍हारे लिए और भी हजारों औरते दुनिया में है । तुम कीमत आदा करके मन चाही सभी प्राप्त कर सकते हो, फिर क़्यों मेरी पत्‍नी के पीछी पडे हो ?’’ विनोद बोल ।
‘‘मुश्किल यही है बाबू खोटा का दिल जिस पर आया है वह उसे पैसों के बल पर नहीं मिल सकती, उसे उसकी शाएिक़्त के बल पर ही मिल सकती है’’
‘‘कमीने मेरी पत्‍नी की ओर आंख भी उठाई तो मैं तेरी जान ले
लूंगा...’’ यह कहते हुए विनोद खोटा पर झपटा और उस पर बे तहाशा घूसें बरसाने लगा ।
हक़्का बक़्का खोटा विनोद के वार से स्वयं को बचाने का प्रयत्न करने लगा । आचानक रास्ता चलते कुछ लेगों ने विनोद को पकड लिया, कुछ ने खोटा को और वह किसी तरह विनोद को आफिस जाने के बजाए घर ले जाने में सपकल हो गई । खोटा से विनोद के टकराव ने उसे आतंकित कर दिया था ।
उसे विश्वास था कि खोटा इस अपमान का बदल जरूर लेगा और किस तरह लेगा इस कल्‍पना से ही वह कांप जाती थी ।
वह विनोद को बहलती रही ।
‘‘खोटा को तुमने ऐसा सबक सिखाया है कि आज के बाद तो ना वह तुमसे उलझेगा ना मेरी ओर आंख उठाने का साहस करेगा । तुमने जो कदम उफ़्या वह बहुत सही था ।’’
यू वह विनोद को बहल रही थी परंतु भीतर ही भीतर कांप रही थी कि खोटा जरूर इसका बदल लेगा ।
आगर उसने विनोद को कुछ किया तो ?
नहीं नहीं ! विनोद को कुछ नहीं होना चाहिए ! विनोद मेरा जीवन है। यदि उसके शरीर पर एक खराश भी आई तो मैं जिंदा नहीं रहूंगी ।
उसे ऐसा अनुभव हो रहा था उसके कारण यह युद्ध छिडा है । इस युद्ध का आंत दोनो पक्षों का आंत है इसके सिवा कोई पारिणाम निकल भी नहीं सकता।
भालई इसी में है कि दोनो पक्षों के बीच संधी करा दी जाए, ताकि युद्ध कि स्थिति ही पैदा ना हो ।
परंतु यह संधी किस प्रकार संभाव थी । खोटा बदले की आग में झुलस रहा होगा और जब तक बदले की यह आग नहीं बुझेगी उसे चैन नहीं आएगा ।
उसे खोटा एक आजगर अनुभव हो रहा था । जो उसके सामने खडा उसे निगलने के लिए अपनी जीप बार बार लपलपाता और पुंकपककारता । उस आजगर से उसे अपनी रश करनी थी ।
दूसरे दिन वह आफिस जाने लगी तो पान पर खोटा का सामना हो गया वह क्रोधभारी द़ष्टि से उसे घूर रहा था । उसने मुस्काकर देखा और आगे बढ गई ।
उसे मुस्काता देखकर खोटा आश्चर्य से उसे आंखें फाड फाडकर देखता रहा ।
एक दिन फिर वह आफिस जाने लगी तो मुस्काता हुआ खोटा उसका रास्ता रोककर खडा हो गया ।
उसकी आखों में एक चमक थी ।
‘‘मेरा रास्ता छोड दो’’ वह क्रोधभारी द़ष्टिसे खोटा को घूरती बोली ।
‘‘जानम ! अब तो हमरे तुम्‍हारे रास्ते एक ही है’’ कहते हुए खोटा ने उसका हाथ पकड लिया ।
उसने एक झटके से अपना हाथ छुडा लिया और समीप खडे नारियल पानी बेचने वाले की गाडी से नारियल छीलने की तेज दरांती उफ़्कर खोटा की ओर शेरनी की तरह लपकी.....
खोटा के चेहरे पर हवाईयां उडने लगीं आचानक वह सिर पर पैर रखकर भागा । वह उसके पीछे दरांती लिए दौड रही थी । फूलती हुई सांसो के साथ खोटा अपनी गाति बढाता जा रहा था ।
जब खोटा उसकी पहुंच से बहुत दूर चल गया तो वह खडी होकर अपनी फूली हुई सांसो पर नियंत्रण पाने का प्रयत्न करने लगी और फिर दरांती को एक ओर पेंकककर आफिस चल दी .....। द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल 09322338918

Hindi Short Story Daldal Peh Tiki Chhat By M.Mubin

कहानी दलदल पर टिकी छत लेखक एम. मुबीन
तीन दिनों में ही पता चल गया कि उसे मगन भाई ने कमरा किराए पर नहीं दिया कमरा किराए पर देने के नाम पर फ़्ग लिया है ।
अब सोचता है तो स्वयं उसे आश्चर्य होता है । उससे इतनी बडी भूल किस तरह हो गई । बस कुछ देर के लिए वह उस बस्‍ती में आया मगन भाई ने उसे अपनी बंद चाल का कमरा खोलकर बताया । 10 बाय 12 का कमरा था । जिसके एक कोने में एक छोटा सा किचन टेबल बना हुआ था । उससे लगकर एक तंग सा बाथ रूम ! जिसे वहां की भाषा में मेरी कहा जाता था । कमरें में एक दरवाजा था जो तंग सी गली में खुलता था दो खिडाकियां थीं जिनके कारण हवा और प्रकाश का अच्‍छा प्रबंध था । पकर्श पर रपक लदी थी, दिवारों का पलस्तर जगह जगह से उखडा हुआ था । पलस्तर सिमेंट का था । छत पतरे की थी । गली के दोनों ओर कच्चे झोंपडों का सिलसिल था जो दूर तक पैकल हुआ था। बीच से एक गंदी नाली बह रही थी जिससे गंदा पानी उबलकर चारों ओर पैकल रहा था । जिसकी र्दुगंध से मस्तिष्‍क फटा जा रहा था । मगनभाई कि उस चाल में सात, आठा कमरे थे । उसके मस्तिष्‍क ने तुरंत उसे निर्णय लेने के लिए विवश कर दिया ।
उसे इस शहर में इतने कम दामें में इतना अच्‍छा कमरा किराए पर नहीं मिल सकता । इस शहर में इससे आच्छे कमरे की आशा रखना बेकार की बात थी और वह तुरंत कमरा किराए पर लेने के लिए तैयार हो गया ।
दूसरे दिन उसने पच्चाीस हजार रूपये डिपाजिट के रूप में आदा किए । मगन भाईने तुरंत किराए के करारनामें के कागजात हस्ताशर करके उसे दे दिए। बिजली और पानी का अपनी तौर पर प्रबंध करने के बाद उसे किराए के रूप में मगनभाई को तीनसौ रूपया महिना देने थे । किराए का करार केवल 11 महीनों का था परंतु मगनभाई ने वादा किया था वह 11 महीनों के बाद भी उससे कमरा खाली नहीं कराएगा । वह जबतक चाहे उस कमरे में रह सकता है । यदि वह कहीं और इससे आच्छे कमरे का प्रबंध कर लेता है तो मगनभाई उसे उसके डिपाजिट की राशि वापस कर देगा ।
उस शाम वह अपने मित्र के घर से अपना थोडा सा सामन लेकर अपने मित्र और उसके घर वालों को आलविदा कहकर अपने नए घर में आ गया ।
दो तीन घंटे तो कमरे की स फाई में लग गए और शेष एक घंटा सामन को कमरे में सजाने में ... !
कमरे में बिजली का प्रबंध था इसलिए सिर्फ बलब लगाना पडा ।
कमरी की स फाई से वह इतना थका गया था कि उस रात वह बिना खाए पिए ही सो गया ।
सवेरे नित्य के समन छ बजे आंख खुली तो वह स्वयं को ताजा अनुभव कर रहा था । पानी आया था घर के सामने एक सरकारी नल पर औरतों की भीड थी ।
‘‘पानी का प्रबंध करना चाहिए !’’ उसने सोचा । परंतु पानी भरने के लिए घर में कोई बर्तन नहीं था । चहलकदमी करते वह अपने घर से थोडी दूर आया तो उसे एक किराने की दुकान दिखाई दी । उस दुकान पर लटके पानी के केन देखकर उसकी बांछे खिल गई । पानी के केन खरीदकर वह नल पर आया और नंबर लगाकर कतारमें खहा हो गया ।
नल पर पानी भरती औरतें उसे विचित्र आंदाज से घूर कर आपसमें आखों से एक दूसरे को कुछ इशारे कर रही थीं ।
उसका नंबर आया तो उसने पानी का केन भारा और अपने घर आया।
स्नान करके उसने कपडे बदले । वह घर में नाश्ता नहीं बना पाया था नाश्ता बनाने के लिए उसके पास आवश्यक सामन नहीं था ।
किसी होटल में नाश्ता करने के बारे में सोचते हुए वह घर से चल दिया।
सोचा नाश्ता करने तक आफिस जाने का समय हो जाएगा उस दिन वह अपने आपको बडा प्रसन्न, चुस्त ओर तरो ताजा अनुभव कर रहा था ।
एक आभास बार बार उसके भीतर करवटें ले रहा था कि अब वह इस शहर में बेघर नहीं है अब इस शहर में उसका अपना घर भी है । उसकी अपनी छत भी है जिसके नीचे वह आराम कर सकता है ।
कल तक यह एहसास उसे कचोकता था इस शहर में उसके पास एक अच्‍छी नौकरी है परंतु उसके पास रहने के लिए एक घर, सिर छिपाने के लिए एक छत नहीं है । वह दूसरे की छत के नीचे शरण लिए हुए है । उस छत की शरण कभी भी उसके सिर से हट सकती है ।
उसे अपनी योग्यता के आधार पर उस शहर में नौकरी तो मिल गई थी, परंतु उसके सामने सबसे बडी समस्या सिर छिपाने की थी । उस शहर में ना तो कोई उसका रिश्तेदार था और ना ही कोई पारिचित ।
उसने नौकरी ज्वाईन तो करली परंतु आवास की समस्या उसके सामने किसी दानव के समन मुंह फाडकर खडी हो गई ।
कुछ दिनों के लिए उस समस्या का हल उसने एक होटल में किराए का कमरा लेकर ढूंढ लिया । परंतु कुछ ही दिनों में उसे अनुभव होने लगा उसे जितना वेतन मिलता है उस वेतन में ना तो वह उस होटल में रह सकता है और ना खा पी सकता है ।
उसने दूसरे सहारे की तलश शुरू की और उसे एक होस्टल में सिर छिपाने का स्थान मिल गया ।
दो चार महीने उसने होस्टल में निकाले परंतु एक दिन वह घोर संकट में फंस गया । एक दिन पुलिस ने होस्टल पर छापा मरा और होस्टल के सारे निवासियों को गिरपक़्तार कर लिया ।
होस्टल से पुलिस को मदक पदार्थ मिले थे । उस होस्टल में कुछ गुंडा तत्व मदक पदार्थो का कारोबार करते थे ।
बडी मुश्किल से वह स्वयं को पुलिस के चंगुल से छुडा सका ।
वह एक बार फिर बेघर हो गया था । वह अपने लिए किसी छत की तलश कर रहा था कि आचानक उसकी मुलकात अपने एक पुराने मित्र से हो गई ।
वह मित्र उसे बहुत दिनों बाद मिल था उस मित्र का उस शहर में एक छोटा सा कारोबार था । उसने जब उस मित्र के सामने अपनी समस्या रखी तो उसने बडे आपनत्व से उसके सामने प्रस्ताव रखा कि जब तक उसका कोई प्रबंध नहीं हो जाता है चाहे तो वह उसके घर मे रह सकता है जब प्रबंध हो जाए तो चले जाना ।
उसे उस समय अपना वह मित्र एक देवता के समन प्रतीत हुआ ।
वह अपने उस मित्र के घर रहने लगा और साथ ही साथ अपने लिए कोई कमरा भी ढूंढने लगा ।
शहर में किराए से मकान मिलना मुश्किल था और मकान खरीदने का उसमें सामर्थ नहीं था । जो मकान किराए पर मिल रहे थे उनका किराया ही उसके आधे वेतन से ज्यादा था । उस पर डिपाजिट की भारी राशि की शर्त....
कुछ दिनों बाद थककर उसने सोचा उसे ऐसे क्षेत्र में मकान तलश करना चाहिए जहा मकानों के दाम कम हो भाले ही उस क्षेत्र का स्तर उसके स्वभाव आनुसार ना हो उसे इन बातों से क़्या लेना देना था । उसे तो केवल रात में सिर छिपाने के लिए एक छत चाहिए थी ।
दिन भर तो उसे उस छत से कुछ लेना देनी नहीं था क़्योंकि दिन भर तो वह आफिस में रहेगा ।
उसे एक इस्टेट इजंट ने मगनभाई से मिलया । मगनभाई ने उसे बताया बस्‍ती में उनकी एक चाल है । उस चाल में एक कमरा खाली है वह कमरा वह उसे पच्चाीस हजार रूपये डिपाजिट पर दे सकता है ।
‘‘ठीक है मगनभाई मैं डिपाजिट का प्रबंध करके आपसे मिलता हूं’’ कहकर वह चल आया और पैसों के प्रबंध में लग गया ।
इतने पैसों का प्रबंध बहुत काफ़्नि काम था । अपने शहर जाकर उसने दोस्तों, रिश्तेदारों से कर्ज लिया, घर के गहने, बँक में रखकर कर्ज लिया और डिपाजिट का प्रबंध करके वह वापस आया और मगनभाई से मिल । मगनभाई ने उसे कमरा दिखाया । उसने कमरा पसंद करके पैसे मगनभाई को दे दिए और अपनी नई छत के नीचे चल आया ।
शाम को अपनी जरूरत की चीजों और सामन से लदा जब वह बस्‍ती में आया तो अपने घर के पास पहुंचकर उसके पैर धरती में गढ गए । गली में चारों और पुलिस पैकली हुई थी ।
‘‘क़्या बात है भाई,’’ उसने एक व्‍यक्ति से पूछा । ‘‘यह गली में पुलिस क़्यों आई है ? क़्या हुआ है ?’’
‘‘और क़्या होगा ? दारू के आड्डे पर झगडा हुआ, झगडे में चाूक चल गया और एक आदमी टपक गया......’’ कहता वह आदमी आगे बढ गया ।
‘‘तो इस स्थान पर शराब का आड्डा भी है’’ सोचता वह आगे बढा । अपने रूम के दरवाजे पर पहंुच कर उसने सामन अपने पैरों पर रखा और कमरे का दरवाजा खोलने लगा ।
सामन कमरे में रखकर ममले का पता लगाने के लिए बाहर आया तो तब तक पुलिस जा चुकी थी और लश भी उठाई जा चुकी थी । आसपास के लेग उस बारे में बाते कर रहे थे ।
‘‘आज तो पुलिस ने आड्डा बंद कर दिया है कल फिर चालू हो
जाएगा ।’’
‘‘यह आड्डां कहा है’’ उसने पूछा तो लेग उसे सिर से पैर तक देखने लगे ।
‘‘बाबू किस दुनिया में हो जिस चाल में तुम रहते ड़ों उसी में तो यह शराब का आड्डा है ।’’
‘‘मेरी चाल में शराब का आड्डा’’ आश्चर्य से वह उछल पडा।
‘‘हा ना केवल शराब का, बालिक एक जुए का आड्डा भी है । एक
कमरें में मदक पदार्थ बिकते है और दूसरे को कमरों में धंदा करने वालियां
रहती है ।’’
यह सुनते ही उसकी आखों के सामने तारे नाचने लगे ।
उसकी चाल मे जुए, शराब और मदक पदार्थ बेचने वालों के आड्डे है यहां वेशाए रहती है और अब वह भी उसी चाल में रह रहा है ।
उस दिन तो उसे केवल यह पता चल कि वह कैसी जगह रहने के लिए आया है परंतु दो चार दिनों में यह पता चल गया कि वहां रहना कितना बडा प्रकोप है ।
लेग बेधडक उसके कमरें में घुस आते और उससे तरह तरह की पकरमईशें करने लगते
‘‘एक बोतल चाहिए’’
‘‘जरा एक आफू की गोली देना’’
‘‘एक चरस की पुडिया चाहिए’’
‘‘एक गर्द की पुडिया चाहिए’’
‘‘चंदा को बुलना आज उसका फुल नाईट का रेट देगा’’
वह सब सुनकर अपना सिर पकड लेता और उस व्‍यक्ति को पकड के घर बाहर निकाल देता और उसे बताता कि उसकी इच्छित वस्तु उसे कहा मिल सकती है ।
क़्योंकि इस बीच उसे पता चल गया था कि कहा कौनसा धंदा चलता है और उस धंदे का मलिक कौन है ?
कमरे का दरवाजा खुल रखना एक सिर दर्द था इसलिए उसने कमरे के दरवाजे को हमेशा बंद रखने में ही खैरियत समझी थी । परंतु दरवाजा बंद रखना और भी आधिक सिर दर्द था ।
दरवाजा जोरजोर से पाटी जाता जैसे अभी तोड दिया जाएगा । वह दरवाजा खोलता तो वही प्रश्न सामने होते थे जो दरवाजा खुल रखने पर आजनाबियों द्वारा घर में घुसकर पूछे जाते थे ।
वह सोचता वह आकेल है केवल रात को सोने के लिए यहां आता है तो उसकी यह हालत है यदि उसका परिवार इस कमरे में रह रहा होता तो ? इस कल्‍पना से ही वह कांप उठता था ।
यहां उसके आकेले का रहना मुश्किल है तो वह भाल यहां अपने परिवार को लने का किस तरह सोच सकता है ?
हर दिन एक नई कहानी, एक नया हंगाम, एक नई घटना सामने आती थी । शराबी जुआरियों का आपसमें लडना तो एक आम सी बात थी । एक ग्राहक चंपा के घर में जाने के बजाए सामने वाले रघु के घर में घुस गया और उसकी पत्‍नी से छेडछाड करने लगा ।
परंतु इस छत के नीचे तो हर शण आतंक में रहकर गुजारना है ।
इन बातों से घबराकर उसने निर्णय ले लिया कि उसे यह घर छोड देना चाहिए जब तक किसी और छत का प्रबंध नहीं हो जाता भाले ही उसे बेघर रहना पडे परंतु इस प्रकोप और आतंक से तो वह बचा रहेगा ।
वह सीधा मगनभाई के पास गया और बोल ‘‘मेरा डिपाजिट वापस कर दिजिए मुझे आपके कमरे में नहीं रहना है ?’’
‘‘अरे तुम ग्यारह महीने से पहले वह कमरा किस तरह वापस कर सकते हो । हमरा ग्यारह महीने के किराए का एग्राीमेंट हुआ है । ग्यारह महिने से पहले तुमहारा डिपाजिट किस तरह वापस कर सकता हूं ।’’
‘‘तुम ग्यारह महीने की बात करते हो मैं उस स्थान पर एक पल भी नहीं रह सकता अपनी पूरी चाल तुमने, शराब, जुए, वेश्या के आड्डे चलने वालों को किराए पर दे रखी है और वही जगह मुझ जैसे सज्जन व्‍यक्ति को भी धोखे से किराए पर दे दी । तुम्‍हें ऐसा नीच काम करते हुए शर्म आनी चाहिए थी । मेरे बजाए किसी शराब, जुए वेश्या का आड्डा चलने वाले को देते वह तुम्‍हें ज्यादा किराया देता ।’’
‘‘अरे भाई, उन लेगों को मैंने किराए पर कमरे कहा दिए है । मैंने उस जगह चाल बाई थी और इस ललच में कमरे किराए पर नही दिए थी कि मुझे ज्यादा डिपाजिट और किराया मिलेगा वे गुण्डे बदमश लेग ताले तोडकर उन कमरोंमें घुस गए और अपने काले धंदे करने लगे । मैंने सिर्फ एक शरीपक आदमी को वहां वह कमरा किराए पर दिया था जो उस वातावरण को देख कर कुछ दिनों में ही भाग गया । उस कमरे पर भी गुंडे कब्जा ना करले इसलिए वह कमरा मैंने तुम्‍हें किराए पर दे दिया अब तुम भी उस कमरे को खाली करने की बात कर रहे हो अरे बाबा जाओ मैं वह कमरा तुम्‍हें दे दिया हमेशा के लिए दे दिया । मुझे उस कमरे का किराया भी नहीं देना । यदि तुम वह कमरा छोड दोगे, और मैं तुम्‍हें तुमहारा डिपाजिट वापस दूंगा तो उस कमरे पर कोई गुंडा कब्जा कर लेगा ।’’
मगनभाई की बात सुनकर उसका क्रोधठंडा पड गया । उसे लगा मगनभाई तो उससे आधिक दया का पात्र है ।
‘‘मगनभाई, गुंडो ने तुमहारी पूरी चाल पर कब्जा कर लिया और तुमने पुलिस में शिकायत भी नहीं की ।’’
‘‘शिकायत करके क़्या मुझे अपना जीवन गंवाना है ? वे सब गुण्डे लेग है उनके मुंह कौन लगेगा । पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाडेगी । पुलिस उनसे मिली हुई है । शिकायत पर थोडी देर के लिए उन्‍हे आंदर कर देगी बाद में आजाद होकर वे मेरी जान के दुश्मन बन जाएंगे इसलिए मैंने यह सोच लिया है कि वह मेरी चाल है ही नहीं मुझे धंदे में घाटा हो गया है । देखो आगर तुम वहां रहना नहीं चाहते हो तो किसी को भी वह कमरा अपना डिपाजिट लेकर किराए पर दे दो मैं उसे नया किराया नाम बनाकर दे दूंगा ।’0ं
मगनभाई की बातें सुनकर वह चुपचाप वापस घर आ गया । उस रात उसे रात भर नीदं नहीं आई । उसके सामने एक ही प्रश्न था । वह वहां रहे या वहां से चल जाए ?
फिलहाल तो ऐसी परिस्थिती थी वह उस स्थान से कहीं भी जा नहीं सकता था और वहां रहना एक प्रकोप था ।
परंतु वह इतना भी कायर नहीं था किस प्रकोप से भायभीत होकर पलयन कर दे ।
उसने स्वयंको हर तरह की परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार कर लिया । उसे केवल रातही में तो उन मनासिक यातनाओं को झेलना पडता था । दिन में तो वह आफिस में रहता था ।
दिन में वहां क़्या होता है, या जो कुछ होता है उसे उन बातों से कुछ लेना देना नहीं था । परंतु रात घर आने पर दिने में जो कुछ वहां हुआ है उसे सब मलूम पड जाता था ।
दो शराबियों ने उषा को छेडा ।
एक गुंडे ने आशोक की पत्‍नी की इज्जत लूटने की कोशिश की ।
गुंडो में जमकर मर पीट हुई कई घायल हुए आज गुंडो के टकराव में पिस्तौल चल पडी । गोली से कोई गुंडा घायल तो नहीं हुआ परंतु गोली सामने वाले लक़मण के लडके को जा लगी जिसे आस्पताल ले जाया गया उसकी स्थिति नाजुक है ।
जो लेग उसे यह कहानियां सुनाते वह उनपर बरस पडता
‘‘कब तक तुम लेग यह सब सहन करते रहोगे ? तुम शरीपक लेग हो, यह शरीपकों का मेहलल है, गुंडो ने इस पर कब्जा करके शरीपकों को यहां रहने के लयक नहीं रखा है । तुम चुपचाप सब सहन करते रहे तो तुम लेगों के साथ भी यही सब होने वाल है । यदि इससे मुएिक़्त चाहते हो तो इसके विरूध एक हो जाओ और इसके विरूध आवाज उठाओ... गुंडो और बदमशों के विरूद्ध पुलिस में शिकायत करो । तुमहारी शिकायत पर पुलिस को कारवाई करनी ही पडेगी और यह सब रूक जाएगा ।’’
‘‘जावेद भाई हम ये सब नहीं कर सकते’’ उसकी बातें सुनकर वे सहम गए । ‘‘यदि हमने ऐसा किया तो संभाव है पुलिस कारवाई करे, परंतु वह ज्यादा दिनों तक गुण्डों को लकआप में नहीं रख पाएंगे । पुलिस में शिकायत करने पर वह हमरे शत्रु बन जाएंगे और आजाद होते ही हमसे बदल जरूर लोंगे। इसलिए हम सोचते है उन गुण्डों से क़्या उलझा जाए ? जो कुछ हो रहा है उसे चुपचाप सहन करने में ही भालई है ।’’
‘‘यही तो आप लेगों की कमजोरी है । विरोध करने का ना साहस है ना शाएिक़्त, जिससे गुंडो का साहस बढता जा रहा है । विरोध नहीं कर सकते सब गलत सलत सहन कर लेगे ।’’ वह क्रोधमें बोल ‘‘यदि मेरे साथ एक दिन भी ऐसा कुछ हुआ तो मैं बिलकुल सहन नहीं करूंगा । जो मेरे साथ ऐसी वेसी हरकत करेगा उसे मजा चखाउंगा....!’’
दूसरे दिन जब वह आफिस से आया तो उसे तीन चार गुंडो ने घेर लिया । उनकी सूरते और चेहरे ही बता रहे थे वे गुंडे है ।
‘‘ऐ बाबू, क़्यों बे ! क़्यों बहुत बडा लीडर बनने की कोशिश कर रहा है ? बस्‍ती वालों को हमरे विरूध भाडका रहा है तू नया नया है इसलिए तुझे हमरी ताकत का आंदाजा नहीं है । ये लेग पुराने है इन्‍हे हमरी ताकत का पता है इसलिए ये कभी हमसे नहीं उलझते । आगर यहां रहना है तो भालई इसी में है कि तुम भी पुराने बन जाओ । हमरी शाएिक़्त जान ले और हमसे मत उसझो जैसा चल रहा है चलने दो... जो कुछ हो रहा है होने दो...’’ एक गुंडा उसे घुरता बोल ।
‘‘दादा ! यह बातों से नहीं मनेगा एक दो हड्डाी पसली टूटेगी तो सारी लीडरी भूल जाएगा । इसे अभी मजा चखाता हूं’’ कहते एक गुंडे ने अपनी हाकी स्टाीक हवा में लहराई ।
‘‘नहीं आज के लिए इतनी वार्निंग कापकी है ।’’ उस गुंडे ने हाकी वाले गुंडो को रोका ।
‘‘इसके बाद इसने होशियारी की तो मेरी ओर से इसकी चार हाड्डियां ज्यादा तोडना कहता वह सबको लेकर चल गया... ।’’
वह सन्नाटे में आ गया । उसका सारा शरीर पसीने में भीग गया उसे ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे कई हाकी स्टाीक उसके शरीर से टकराए है । उसका शरीर पीडा का पकोडा बना हुआ है ।
उसे रात भर नींद नहीं आई ।
आंखो के सामने गुंडो के चेहरे और कानो में उनकी वार्निंग गूंजती रही। यदि आज वे गुंडे हाथ उठा देते तो वह किस प्रकार स्वयं को उनसे बचा पाता ?
उसके मस्तिष्‍क में एक ही बात चकरा रही थी जो आज टल गया वह कल हो भी सकता है ।
इससे बचने का एकही रास्ता है वह यहां चुपचाप आंखे बंद करके रहे। जो कुछ यहां हो रहा है उससे आंजान बना रहे तो उसे कभी कोई खतरा नहीं होगा । परंतु वहां रहना भी तो किसी नरक में रहने से कम नहीं था ।
आए दिन गुंडो के झगडे, पकसाद, दंगा, शराबी, जुआरी, नशेबाज, लेगों का बेधडक घर में घुस आना.... बदतमीजी से दरवाजा पीटना, बार बार पुलिस के छापे, छापों में गुंडे, बदमसों का निकल भागना शरीपों का पकडा जाना ।
बात बात पर चाकु, छुरी का चलना । आसपास रहने वालों की पत्‍नी, बहनों, मंओ से गुण्डों की बदतमीजिया ।
वह सोचने लगा किसी से डिपाजिट लेकर यह कमरा उसे देकर इस नरक से निकल जाए फिर सोचता वह आकेल इस नरक में नहीं रह पाता है कोई शरीपक, बाल बच्चे वाले को इस नरक में डालना क़्या उचित होगा ?
उसकी अंतरआत्म इसके लिए तैयार नही होती थी और उसे उस छत के नीचे रहने के लिए स्वयं से समझौता करना पडा .....! द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
मोबाईल 09322338918

Hindi Short Story Kahin Kuch Ghalat By M.Mubin

कहानी कहीं कुछ ग़लत लेखक एम. मुबीन
तीन दिन से परिस्थितियां बिलकुल उसके विपारित चल रही थीं और वह क़्या करें उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था ।
तीन दिन पहले किशोर पर दिल का दौरा पडा था और उसे आस्पताल में दाखिल करना पडा था ।
जिस दिन किशोर आस्पताल में दाखिल हुआ था उस दिन शहर में उसकी चार सभाएं थी - चार बडे बडे उपनगरों की महिल मंडल की शाखाओंने उसकी अध्‍यक्षता में ढ़ाीमती लता गुप्ता पर हुए आत्याचारों के विरोध में सभाएं रखी थी ना केवल उसे उन सभाओं में धुआंधार भाषण भी करने थे ।
रात में ही उसने सारी तैयारियां कर ली थी ।
तीनो सभाओं में क़्या भाषण करना है वह लिख लिया था । तीनों सभाओं में भाषण तो एक ही करना था बस थोडा सा अंतर उसने उन तीनों भाषणों में कर दिया था । किस सभा के लिए कौनसी साडी, कौनसे गहने पहनने है । कैसा मेकआप करना है तय कर लिया था ।
परंतु सवेरे 6 बजे किशोर के सीने में हलका सा दर्द उठा ।
प्राथामिक उपचार के बाद भी जब आराम नहीं हुआ तो उसने अपने पैकामिली डाक़्टर को पकोन कर के बुल लिया ।
डाक़्टर ने जांच करने के बाद घोषणा कर दी कि संकेत को दिल का दौरा आया है तुरंत आस्पताल ले जाना जरूरी है ।
किशोर को एक हार्ट स्पेशालिस्ट के पास ले जाया गया । उसने तुरंत किशोर को इन्सेन्टाीव केयर युनिट में दाखिल करके उपचार शुरू कर दिया ।
ग्यारह बज गए ।
ग्यारह बजे उसकी दादर में सभा थी ।
उसके लिए बडी परीश की घडी थी । एक ओर पाति था तो दूसरी ओर सभा ।
यदि पाति का ध्यान रखते हुए सभा में नहीं जाती है तो अभी तक जो इज्जत, मन-सममन उसने बनाया था उसपर प्रभाव पड सकता है ।
ऐसी हालत में पाति को छोडकर सभा में जाती है तो चारों ओर से उस पर उंगालियां उठेगी ।
‘‘देखो, कैसी औरत है पाति की जान पर बनी है और इसे नेतागिरी की सूझी है ।’’
‘‘नारी स्वतंत्रता का नारा लगाने वाली नारियां यही करती है ।’’
‘‘भाई ये आधुनिक नारी है इनके लिए इनकी स्वतंत्रता और आधुनिकता ही सब कुछ है । मनवी रिश्ते चाहे पाति हो या बच्चे इनके लिए कोई महत्व नहीं रखते ।’’
जब उससे सहन नहीं हो सका तो उसने उस स्थान पर पकोन लगाया जहा पर सभा थी ।
‘‘मिसेस वर्म’’ दूसरी ओर से कहा गया सारे मेहमन समयपर आ गए है सभा के लिए भी कापकी भीड जम हो गई है । बस आपही का इंतेजार है । आप आएं तो सभा की कारवाई शुरू करें ।’’
उसने पकोन तो इसलिए लगाया थी कि वह सभा संचालिका को बता दे कि वह सभा में नहीं आ सकती ऐसी मजबूरी है परंतु दूसरी ओर की रिपोर्ट सुनकर उसे लगा यदि वह सभा में ना जाए तो सभा पक़्लाप हो जाएगी और सभा में ना जाने के कारण उसके नाम पर भी धब्बा लगेगा ।
‘‘बस मैं आ रही हूं’’ कहते उसने पकोन रख दिया ।
उसी समय डाक़्टर ने आकर उसे खुशखबरी सुनाई
‘‘मिसेज वर्म घबराने और चिंता करने की कोई बात नहीं है, मिस्टर वर्म खतरे से बाहर है ममूली सा दौरा था जिस पर हमने नियंत्रण पा लिया अब उन्‍हे आराम की जरूरत है । आप चाहें तो उनसे मिल सकती है ।’’
डाक़्टर की यह बात सुनते ही वर तीर की तरह किशोर के पास पहुंची।
‘‘किशोर तुम कैसे हो ?’’
‘‘अब फ़ीक हूं’’ किशोर के होठों पर फीकी मुस्कान उभर आई उसका चेहरा पील पहा हुआ था और चेहरे से निर्बलता टपक रही थी ।
‘‘तुम्‍हें कोई तकलीपक तो नहीं है ?’’
‘‘नहीं अब मैं बिलकुल ठीक हूं ’’
‘‘तुम्‍हें मेरी जरूर तो नहीं है ?’’
‘‘क़्यों ? तुम यह सवाल क़्यों पूछ रही हो ?’’
‘‘किशोर, तुम तो जानते ही हो चारों उपनगरों में आज मेरी सभाएं
है दादर की सभा तो आरंभा होने वाली है बस मेरा इंतजार हो रहा है... मैं
जाऊं ।’’
‘‘जाओ’’ किशोर ने मुर्दा स्वर में उत्तर दिया ।
‘‘किशोर मुझे वापस आने में देर भी लग सकती है’’
‘‘कोई बात नहीं,’’ किशोर बोल ‘‘मेरी देखभाल के लिए डाक़्टर और नर्से है ।’’
‘‘थैंक़्स किशोर, तुम कितने समझदार हो, मेरा कितना ख्याल रखते हो। भागवान तुम्‍हारे जैसा समझदार पाति हर स्‍त्री को दे ।’’ कहती वह किशोर का मथा चूमकर बिजली की तरह वार्ड से बाहर निकल गई ।
उसने ड्राईवर को आंधी तू फान की तरह सभागॄह पहुंचने का आदेश दिया । ड्राईवर ने भी आदेश का पालन किया और वह ठीक समय पर सभागॄह पहुंच गई ।
सभा में उसने बडा जोरदार भाषण किया । उसके हर वाक़्य पर हाल तालियों से गूंज उठता था ।
अब वह जमना लद गया जब औरतें घूंघट मुंह पर डाले घर की चाल दीवारी में सारा जीवन गुजार देती थी । आज की नारी जीवन के हर क्षेत्र में पुरूय्रों के साथ साथ पुरूय्रों के एंकधे से एंकधा मिलकर चलना चाहती है । बडे बडे विद्वानो ने इस बात को स्वाीकार किया कि देश की प्रगाति के लिए महिलओं की सहायता और राळ्राीय कार्यक्रमें में उनका सहभाग बहुत जरूरी है आज वही देश प्रगाति कर रहे है जिन देशों की स्रिया देश के राळ्राीय कार्यक्रमें में भाग लेती है । महिल मंडल भी एक ऐसी संस्था है जो राळ्र के हित और देशकी तरक़्काी के लिए नए नए कार्यक्रम चलता है उन कार्यक्रमें में महिलओंका शामिल होना देश की प्रगाति में हाथ बटाना होता है । लता गुप्ता भी उन्‍हीं कार्यक्रमें में शामिल होती थी और देश की प्रगाति के लिए काम करती थी । उसका महिल मंडल के कार्यक्रमें में शामिल होना क़्या कोई पाप था ? आगर नहीं था तो फिर उसे इन कार्यक्रमें में शामिल होने से क़्यों रोका गया ? ना केवल रोका गया बालिक उसे उसके इस आपराध की ऐसी घाीनौनी सजा दी गई है कि सादियों तक उस सजा को सुनकर मानवता कांपेगी । उसके हाथ, पैर और चेहरा जलती सलखों से दागा गया है और यह घिनौना कार्य और आपराध करने वाल आपराधी विनोद गुप्ता है जो अबतक अपनी पहुंच के कारण आजाद है । कितनी विडमबना है । बात है आज के दौर में जब सारी दुनिया में औरतों की स्वतंत्रता की बात चलकर औरतों को समन आधिकार दिए जा रहे है । यहां भरतकी नारी दमन और आत्याचार की शिकार है । उसके लिए स्वतंत्रता की बात करना पाप है । राळ्राहित के लिए काम करना पाप है । मिसेस गुप्ताने यह साहस किया तो उसके साहस की उसे यह सजा मिली कि उसके हाथों और चेहरे को जलती सलखों से दागा गया और यह आपराध करने वाल उसका आपराधी पाति अब भी आजाद है । लता के साथ इन्सापक नहीं हुआ है । हम लता के लिए इन्सापक चाहती है । यदि लता के साथ न्याय नहीं किया गया, उसके पाति को उसके कुकर्म की सजा नहीं दी गई तो हम सब नारी जाती इसके लिए आंदोलन करेंगी ।
इसी प्रकार के भाषण उसने चारों सभाओं में दिए उसके भाषण पर खूब तालियां बजी और उसकी जय जयकार भी हुई । लता गुप्ता, सुमन वर्म जिंदाबाद । ‘विनोद गुप्ता हाय हाय के नारे भी लगे ।’
रात के ग्यारह बजे उसकी आंतिम सभा समप्त हुई और वह सभा से सीधी आस्पताल पहुंची ।
इस बीच उसने बहुत चाहा कि वह आस्पताल पकोन लगाकर किशोर से बात करके उसकी हालत, खैरियत पूछे परंतू उसे समय ही नहीं मिल सका ।
जब वह आस्पताल पहुंची तो किशोर गहरी नींद सो रहा था ।
‘‘हमने उन्‍हे नींद का इंजेक़्शन दिया है ताकि उन्‍हे गहरी नींद आए और उन्‍हे ज्यादा से ज्यादा आराम मिले ।’’ डाक़्टर ने उसे बताया ।
‘‘मिसेस वर्म आप दिनभर कहा थी ? किशोर साहब बार बार आपको पूछते रहे थे ?’’
‘‘मैं बहुत जरूरी काम से गई थी डाक़्टर साहब’’ वह बोली । ‘‘मैं उन्‍हे बताकर गई थी फिर भी वे मेरे बारे में पूछ रहे थे ?’’
‘‘हा, डाक़्टर बोल, उनकी तकलीपक कुछ बढ रही थी । जाहिर सी बात है ऐसा हालत में वे आपको ही पूछेंगे । वैसे हमने दवाओं से बढती तकलीपक पर नियंत्रण पा लिया था परंतु वह कहते है ना कभी कभी दवाओं से आधिक प्रभावी किसी अपने का सामिय्र्य होता है इसलिए मेरा याहि परामर्श है आप ज्यादा से ज्यादा मिस्टर वर्म के पास रहने का प्रयत्न करे ।’’
‘‘जी’’ उसने उत्तर दिया तो डाक़्टर कमरे के बाहर चल गया ।
किशोर पलांग पर निश्चिंत सोया था ।
दिनभर की दौड-धूप के बाद उसका सारा शरीर टूट रहा था । आंखे नींद से बेझिल हो रही थी । मनचाह रहा था कि वह गहरी नींद सोकर इस थकन को मिटाए ।
परंतु उसे गहरी नींद केवल अपने बिस्तर, अपने कमरे के पलांग पर मिल सकती थी ।
किशोर के पास कोई नहीं था । उसके आने के बाद नर्स भी चली गई थी । शायद यह सोचकर कि अब वह आ गई है वही किशोर की देखरेख करेगी।
उसका किशोर के पास रूकना बहुत जरूरी था । परंतु वह रूक नही सकती थी ।
क़्योंकि दिनभर की थकन उतारने के लिए गहरी नींद जरूरी थी जो किशोर के पास नहीं मिल सकती थी ।
कल भी आज की तरह भागदौह भारा दिन होगा । दो मंत्रियों से मिलकर मेमेंरेंडम देना था । परसों के मेर्चे की तैयारी करनी थी । जुलूस निकालने के लिए पुलिस की आनुमती लेनी थी मेर्चे के लिए संबंधित लेगों को सुचित करना था । पत्रकार पारिषद में मेर्च के उद्देश बताने थे । मुख्य उद्देश विनोद की गिरपक़्तारी, उसे सख्त से सख्त सजा दिलवानी थी । लता गुप्ता के लिए यही सबसे बडा न्याय था ।
लता आस्पताल में थी । पुलिस ने विनोद को गिरपक़्तार किया था । परंतु फिर जमनत पर यह कहकर छोह दिया था कि लता अभी तक अपना बयान नहीं दे पाई जिसके आधार पर विनोद को गिरपक़्तार करके उसके विरूद्ध कार्यवाही की जा सके ।
और उन लेगों की मंग थी विनोद को गिरपक़्तार करते तुरंत हवालत में डाल दिया जाए । लता का बयान आता रहेगा । लता पर विनोद ने जो आत्याचार किए है उसके बाद लता विनोद के विरूद्ध ही बयान देगी । लता के पीछे पूरी मंडल की शाएिक़्त है । मंडल लता को न्याय दिलकर ही रहेगी ।
परंतु पुलिस ने यह कहकर दोबारा विनोद को गिरपक़्तार करने से इंकार कर दिया था कि बिना लता के बयान के हम विनोद पर हाथ नहीं डाल सकते। बस इसी के विरोध में उन्‍हों यह आंदोलन छेड रखा था । लता उनके मंडल की एक इकाई की सदस्य थी । वह मंडल की मिटिंगों में नियामित आती थी इसी पर उसके और उसके पाति के बीच बार बार विवाद होता था । पातिका कहना था घर के जरूरी काम छोडकर वह मिटींगो मे ना जाया करे और लगा पाति की बात नहीं मनती थी । इसी बात पर विवाद बढा था ।
लती मिटींग में जाने पर आडी थी । इस पर विनोद ने गरम सलखों से उसके हाथ, पैर, चेहरा दाग दिया । ।
उपक !
इसे सुनकर हर कोई कांप उठा था और तहप उठा था । आपराधी को सजा दिलने के लिए हर किसी ने कमर कस रखी थी और इसी के लिए यह आंन्दोलन छिहा हुआ था । अध्‍यक्ष के नाते वह तो सा#िकय ही थी परंतु किशोर की बिमरी इस आंदोलन की राह में एक रोडा बन गई थी ।
यही बातें सोचते सोचते वह पास वाले पलांगपर बेखबर सो गई ।
कब आंख खुली पता नहीं परंतु इतना आभास जरूर हुआ कि किशोर उसे आवाज दे रहा है ।
‘‘क़्या बात है ?’’ वह आंखे मलते-मलते ही उठी ।
‘‘पानी देना’’ किशोर बोल ‘‘मैं कबसे आवाजें दे रहा हूं घंटी बजाने पर कोई नर्स भी नहीं आती ।’’
उसने किशोर को पानी दिया और जाकर डयूटी नर्सपर बरस पडी ।
‘‘मेरे पाति कब से घंटी बजा रहे है कोई आने को तैयार नहीं । क़्या इसके लिए तुम इतने उंचे चार्ज लेते हो ? यही सेवा है ? मैं उपरतक तुम लेगों की शिकायत कर दूंगी ।’’
‘‘मौडम हम समझे आप है... इसलिए नहीं आई’’ नर्से डरते डरते बोली।
‘‘मैं सो रही थी ‘‘वह पैर पटक कर बोली,’’ यदि मेरी आंख नहीं खुलती तो मेरा पाति प्यासा तहप-तहप के मर जाता, कहती वह पैर पटकती दोबारा कमरे में आई ।
‘‘सुमन मेरे पास बैठों’’ किशोर बोल मुझे नदीं नहीं आ रही है ।
‘‘तुमहारी तबीतय तो ठीक है नां ?’’
‘‘हा ठीक है’’ किशोर ने उत्तर दिया सिर्फ नींद नहीं आ रही है ।
‘‘किशोर तुम सोने की कोशिश करों’’ वह बोली मुझे कल बहुत जरूरी काम है दिनभर की भाग दौह से बुरी तरह थक गई हूं प्लीज मुझे सोने दो ’’
‘‘ओके डार्लींग’’ किशोर बोल ।
सवेरे आंख खुली तो 6 बज रहे थे फिर भी नींद का खुमर नहीं उतरा था ।
‘‘किशोर तुमहारी तबीयत कैसी है ?’’
‘‘ठीक है परंतु रात भर नहीं सो सका...’’
किशोर से एक दो बातें करने के बाद वह घर चली आई यह कहकर कि वह दोपहर में आएगी ।
घर आई तो आया सोनू को स्‍कूल जाने के लिए तैयार कर रही थी ।
‘‘मेम साहब बाबा स्‍कूल जाने के लिए नहीं कह रहा है’’
‘‘क़्या बात है बेटे तुम स्‍कूल क़्यों नहीं जाना चाहते ?’’
‘‘मममी मेरी तबीयत ठीक नही है’’ सोनू बोल ।
‘‘यह अच्‍छी बात नहीं है बेटे’’ वह सोनू से बोली ।
‘‘मेम साहब बाबा को कुछ कुछ बुखार सा लग रहा है ।’’ उसने सोनू की गर्दन पर हाथ रखा तो उसका दिल धक से रह गया ।
सोनू को हलकासा बुखार था ।
‘‘आया सोनू को पहले डाक़्टर को बता आओ फिर स्‍कूल ले जाना... मुझे आज बहुत काम है ।’’
‘‘जी मेम साहब’’ आया बोली और वह तैयार होने के लिए अपने कमरे की ओर बढ गई ।
वह बडे भागदौड और थका देने वाल दिन था । एक दो मंत्रियों से बातें हुई थी । एक दो आधिकारियों को डराया-धमकाया गया था । मेर्चे के लिए पुलिस की आनुमति मंगी गई थी और आंत मे जाकर सब लता से मिली थी और उसे बताया था कि, उसे न्याय दिलने के लिए वे सब क़्या कर रही हैैं ।
‘‘यह सब आप क़्यों कर रही है’’ सारी बातें सुनकर लता बोली ‘‘इस प्रकार तो विनोद संकट मे आ जाएगा ।’’
‘‘हम यही तो चाहती है कि पुलिस विनोद को गिरपक़्तार करें और उसे कडी सी कडी सजा दे ।’’
‘‘परंतु किस लिए ?’’
‘‘उस आपराध और आत्याचार के लिए जो विनोद ने तुमपर किये है । महिल मंडल की मिटिंगो मे शामिल ना होने के लिए तुम्‍हारे हाथ, पैर, चेहरा और शरीर को गरम सलखों से दागा ।’’
‘‘नहीं यह झूठा है कि उन्‍हों मेरे शरीर को दागा’’ लता बोली ।
‘‘यह सच है कि उस दिन उनकी तबीयत ठीक ना होने के कारण मुझे मिटींग में जाने से उन्‍हों रोका जब मैं नही मनी तो डराने के लिए वे सलखे गरम करके लए परंतु उससे मुझे दागने का उनका आशय कतई नहीं था । घबराकर मैंने उन्‍हे पीछे धकेल तो सलख उनके हाथ से छूट गई और मेरे चेहरे और शरीर पर लगने से वह जल गया । इतनी सी बात का आप बतंगड ना बनाईए आपके इस आंदोलन के कारण पुलिस विनोद को गिरपक़्तार कर लेगी । हमरा दांपत्य जीवन खतरे में पह जाएगा ।’’
लता के इस बयान के बाद तो हर किसीने अपना सिर पकड लिया । उन्‍हे लगा जैसे वे अपनी परछाईयों से लह रही है । अच्‍छा हुआ लता ने पुलिस को बयान नहीं दिया वरना सब किए कराए पर पानी फिर जाता ।
कल इतने बडे विराट मेर्चे का आयोजन किया गया है और यहां तो उसका कारण ही खत्म हो रहा है । लता को बडी मुश्किल से समझा-बुझकर इस बात के लिए रोका गया कि वह कोई भी बहाना बनाकर पुलिस को कल तक बयान ना दे ।
यह तय किया गया कि कल निकलने वाल मेर्चा रद ना किया जाए मेर्चा ना निकालने पर पूरे महिल मंडल की बदनामी होगी ।
कल का मेर्चा निकल पाए फिर बाद में चाहे कुछ भी हो । चाहे लता पुलिस को बयान देकर उसे निर्दोष सिद्ध कर दे ।
शाम को आस्पताल पहुंची तो डाक़्टर नर्से किशोर को घेरे हुई थी ।
‘‘क़्या हुआ डाक़्टर’’ किशोर की हालत देखकर उसका दिल धक से रह गया ।
‘‘मि. वर्म के सीने में दर्द हो रहा था हम घबरा गए उन्‍हे फिर दौरा ना पडा हो, परंतु ऐसी बात नहीं है ।’’
डाक़्टर और नर्से उपचार करने के बाद चली गई ।
वह किशोर को सांत्वना देने लगी की वह ना घबराए उसे कुछ नहीं हुआ है । किशोर यह पूछ रहा था कि वह दोपहर को आस्पताल क़्यों नहीं आई तो वह विस्तार से किशोर को बताने लगी की आज क़्या-क़्या हुआ ।
आचानक उसे सोनू की याद आई तो उसने घर पकोन लगाकर नौकरानी से सोनू के बारे में पूछा ।
‘‘मेम साहब बाबा का बुखार बहुत बढ़ गया है । वह आपको याद कर रहा है ।’’
‘‘मैं अभी आई’’ कहकर उसने पकोन रख दिया और किशोर के पास आकर बोली
‘‘किशोर सोनू को बहुत बुखार है मेरा उसके पास रहना जरूरी है तुम आजकी रात किसी तरह आकेले गुजार ले ।’’
‘‘ठीक है’’ उसकी बात सुनकर किशोर मरे स्वर में बोल ।
रातभर सोनू को सख्त बुखार रहा । वह थोडी देर के लिए सो जाती । जागती तो सोनू को उसी स्थिति में पाती ।
दिन निकल तो उसकी स्थिति वैसी ही थी ।
ना चाहते हुए भी वह मेर्चे में जाने की तैयारी में लग गई ।
सोनू रो रहा था ।
‘‘मममी मुझे छोडकर मत जाईये ।’’
‘‘मैं अभी आ जाऊंगी बेटा’’ वह बोली । ‘‘आया बाबा को डाक़्टर के पास ले जाना ।’’
‘‘जी मेम साहब’’ आया बोली ।
वह घर से निकल ही रही थी कि आस्पताल से पकोन आया किशोर पर फिर हलका सा दौरा पडा है ।
यह सुनकर वह सन्नाटे में आ गई ।
‘‘ठीक है आ रही हूं’’ कहते हुए उसने पकोन तो रख दिया परंतु बडी दुविधा में पह गई ।
आस्पताल जाए या मेर्चे में । दोनो जगह जाना जरूरी था । यदि मेर्चे में नहीं गई तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा । उसकी बडी बदनामी होगी ।
दिल कहा करके वह मेर्चे के लिए चल दी ।
मेर्चे मे भाग लेने वाली बाकी औरतें आ गई थी परंतु कुछ महत्वपूर्ण हास्तियां गायब थी ।
‘‘मलती क़्यों नहीं आई ?’’
‘‘उसकी बेटी को तेज बुखार है इसलिए नहीं आ सकी’’
‘‘विशाखा’’
‘‘उसके घर मेहमन आए हैैं ।’’
‘‘बरखा’’
‘‘उसका पाति आस्पातल में है ।’’
‘‘राखी’’
‘‘उसके बच्चे की आज परीश है ।’’
वे लेग इसलिए नहीं आई है और वह ?
प्रश्न चिन्‍ह उसके सामने आ खहा हुआ । इसका बेटा घर में बुखार में तप रहा है । फिर भी वह मेर्चे में आई है ।
और वे लेग इतनी जरा-जरासी बात के कारण मेर्चे में नहीं आई .
उसकी समझ में नहीं आ रहा था कौन सही है । वह या वे उसका पाति और बेटा बीमर है और उनका.......
मेर्चे के साथ चलते नारे लगाते उसे लग रहा था आज कहीं कुछ गलत उससे जरूर हुआ है ..... । द द
अप्रकाशित
मौलिक
------------------------समाप्‍त--------------------------------पता
एम मुबीन
303 क्‍लासिक प्‍लाजा़, तीन बत्‍ती
भिवंडी 421 302
जि ठाणे महा
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Hindi Short Story Dharna By M.Mubin

कहानी धरना लेखक एम. मुबीन
सबसे पहले सेक्रेटरी ने उन्‍हे इस बात की खबर दी थी
‘‘अपने आजका आखबार पढा ?’’
‘‘अभी तो जागा हूं आपके पकोन की आवाज से तो भाल आखबार किस तरह पढ सकता हूं ? कहिए क़्या कोई खास खबर है ?’’
‘‘हा, सरकार ने उन स्‍कूलों की लिस्ट जारी की है जिन्‍हे सरकार की ओर से मन्यता प्राप्त नहीं है । उस सुचि में हमरी स्‍कूल का भी नाम है ।’’
‘‘आं क़्या कह रहे है आप ? सरकारने हमरी स्‍कूलको मन्यता नहीं दी? तो क़्या हमरी इतनी भागदौड, पत्रव्यवहांर मंत्रियों, नेताओं से मिलना जुलना सब बेकार गया ?’’
‘‘सब बेकार गया है अध्‍यक्ष जी ! मुझे तो पहले ही भाय था ऐ सा ही होगा और ऐसा ही हुआ... हमें तो पहले ही सूचना मिल गई थी इस वर्ष भी सरकार ने हमरी स्‍कूल को मन्यता नहीं दी और अब तो सारी दुनिया को मलूम पड गया है । इस बात की जानकारी सबको होते ही एक तू फान आ जाएगा अध्‍यक्षजी तू फान....!’’
‘‘हा से#ोकटरी साहब’’ वे चिन्तित स्वर में बोले । उस तू फान के आगमन को मैं भी अनुभव कर रहा हूं...।
और उसके बाद तो कई पकोन आए ।
लेगों को उत्तर देते देते उनका सिर चकराने लगा था । वे तो इस बात से ही चिन्तित हो रहे थे कि लेगों को पकोन पर समझाना काफ़्नि हो रहा है । जब उनका सामना होगा तो वे किस तरह उन्‍हे समझा पाएंगे ?
‘‘गुप्ताजी अपने जो स्‍कूल खोली है उसे तो अभी तक मन्यता भी नहीं मिल पाई है । उस में हमरे बच्चे पढ रहे है यह तो उनकी जीवन से बहुत बडा खिलवाड है ।’’
‘‘गुप्ताजी अपने तो मेरे बच्चे को कहीं का नहीं रखा । आपकी स्‍कूल को अभीतक मन्यता नहीं मिल सकी है इसका आर्थ है आपकी स्‍कूल से निकलने के बाद मेरे बच्चे को कहीं भी दाखल नहीं मिल सकेगा ?’’
‘‘गुप्ताजी, स्‍कूल खोलने के नामपर अपने जनता से लखों रूपया जम किया है । पैसा तो अपने जमकर लिया परंतु अपनी स्‍कूल को मन्यता नहीं दिल सके ?’’
वे सारी बातें सुनने के बाद एक ही उत्तर देते
‘‘आपको चिन्ता करने और उत्तेजित होने की कोई जरूरत नहीं । यह सब सरकारी दावपेच और आडचने है । एक मस के भीतर हमरी स्‍कूल को मन्यता मिल जाएगी ।’’
उन्‍हों बडे विश्वास से सभीको उत्तर दे दिया था और तय भी कर लिया था कि हर किसी को वे यही उत्तर देंगे परंतु वे अपने विश्वास को खोखलेपन के बारे में सोंच सोचकर स्वयं ही कांप उफ़्ते थे ।
दो वर्ष से तो मन्यता प्राप्त करने के लिए सारे प्रयत्न किए जा चुके है। कागजी कार्यवाही और पत्रव्यवहांर से फाईलों का ढेर तैयार हो चुका है । शिश विभाग से शिश मंत्रालय, शिश मंत्रालय से साचिवालय और मुख्य मंत्री के आफिसों के चक़्कर लगाते लगाते उनके साथ साथ से#ोकटरी, कुछ सदस्यों, स्‍कूल के हेडमस्टर, क़्लार्एक और शिशकों की चप्पले घस चुकी है ।
परंतु फिर भी मन्यता नहीं मिल सकी ।
तुरंत मन्यता प्राप्त करने का मर्ग भी बताया गया था । कुछ देकर काम निकाल लिया जाए, परंतु मंग इतनी ज्यादी थी कि उन्‍हे और पूरे बोर्ड को सोचने के लिए विवश होना पडा था ।
बात ऐसी भी नहीं थी कि मंग का प्रबंध नहीं हो सकता था मंग से कई गुना आधिक तो उनके पास जम था ।
परंतु वे अपने उसूल पर आड गया ।
‘‘हम लेगों से, दूसरों से सिर्फ लेते है । भाल हम क़्यों दूसरों को दें और फिर हमजो कुछ कर रहे है इसमें हमरे व्‍यक्तिगत स्वार्थ तो कुछ भी नही है । हम यह सब जनता के लिए कर रहे है हम यह चाहते है कि हमरी स्‍कूल में बच्चे पढकर दुनिया की प्रातिस्पर्धा में टिकने की शमता प्राप्त करें और स्पर्धा में सपकल ड़ों ।’’ इसके लिए उन्‍हों शिश के स्तरपर बहुत आधिक ध्यान दिया था और यह बात तो जनता से भी मनवा ली थी कि उनकी स्‍कूल का पढाई का स्तर शहर की दूसरी स्‍कूलों के स्तर से बहुत उंचा है । शिशक बहुत मेहनत करते है ।
तभी तो उनकी स्‍कूलमें दाखल लेने के लिए बच्चों के आफ्रिभावकों की कतारें लग गई थीं और वे इन्ड़ाी कतारों का तो लभा उफ़्ते थे ।
‘‘देखिए आपतो अच्‍छी तरह जानते है । हमरी स्‍कूल की शिश का स्तर कितना उंचा है । परंतु क़्या करें हमरी स्‍कूल को कोई सरकारी ग्रांट तो मिलती नही आप लेगों से डोनेशन पकीस और जनता से स्‍कूल चलने के लिए जो चंदा मिलता है उसी से यह स्‍कूल चलती है । इसलिए आप हमरी विवशता को समझे। हम डोनेशन के नाम पर जो मंग रहे है, हमरी वह मंग कोई अनुचित मग नहीं है । वह हमरी मजबूरी है इसलिए हमरी मजबूरी को समझते हुए और अपने बच्चों के उज्वल भाविय्र्य के लिए आप ज्यादा से ज्यादा रकम दें ताकि हमें स्‍कूल चलने में कोई कठनाई ना आए और आपके बच्चे का भाविय्र्य बने ।’’
अपनी विवशता बताकर और लेगों को अपने बच्चों के सुनहरे भाविय्र्य का सपना दिखाकर उन्‍हों दाखलों के नाम पर उंची डोनेशन वसूल की थी ।
जिस का कहीं कोई हिसाब किताब नहीं था वे लखों रूपये उनकी तिजोरी में जम थे उनके व्यापार में लगे थे ।
स्‍कूल खोलने के लिए चंदे के नाम पर भीी उन्‍हों लखों रूपये जम किए थे जिनसे उनका कारोबार बढा था और वे आए दिन स्‍कूल के नामपर धनपातियों से दान के रूप में लखों रूपये जम करते रहते थे । इस #िकयामें कितना रूपया जम हुआ और कितना खर्च हो गया कितना बाकी है ? बाकी है भी या नहीं ? इस बारे में तो स्‍कूल के सदस्यों को भी पता नहीं था । कुछ कुछ से#ोकटरी को मलूम था, परंतु वह तो उनका आदमी था ।
सब तो यही जानते थे स्‍कूल की स्थापना की गई, स्‍कूल के लिए जमीन खरीदी गई, उस पर स्‍कूल के लिए जरूरी इमरत बनाई गई । स्‍कूल शुरू हुई स्‍कूल का और स्‍कूल के शिशकों के वेतन का खर्च बढता जा रहा है । सब वे आदा करते है । अब इतने पैसे जम तो नहीं हो सकते । जरूर गुप्ताजी अपनी जेब से भी लगाते ड़ोंगे । बडे आदमी है । भागवान ने धन के साथ दिल भी दिया है तभी तो दिल खोलकर स्‍कूल में पैसा लगाते है ।
हमें स्कुल का सदस्य बना लिया यही उनकी महानता है । इस सदस्यता के बदले में एक पैसा भी तो नहीं लिया । ना अब मंगते है । लेग ऐसे पदों को प्राप्त करने के लिए लखों रूपये खर्च कर डालते है । फिर भी यह पद नहीं मिल पाता है परंतु हमें तो गुप्ताजी ने मुपक़्त में दे दिया बडे दिलवाले है....।
सदस्य अब तक शायद उनके बारे में यहीं सोचते ड़ों परंतु अब जब उन्‍हे पता लगेगा कि अभी तक स्‍कूल को मन्यता नहीं मिल सकी है तो वे जरूर पूछेंगे ‘‘गुप्ताजी, स्‍कूल को अभी तक मन्यता क़्यों नहीं मिल सकी ?’’
‘‘उन्‍हे समझाना कौनसी बडी बात है’’ वे सिर झटककर बहबहाए । ‘‘कह दूगां कि मंत्री मन्यता देने के दस लख मंगते है । स्‍कूल सदस्य के नाते आप लेग एक एक लख दीजिए स्‍कूल को मन्यता मिल जाएगी ।’’
यह सुनते ही सब ठंडे हो जाएंगे । सदस्य मंडल में ऐसे ऐ से एंकजूस जम किए है कि सिगरेट के लिए एक रूपया खर्च करने से भी डरते है । एक लख चंदे की बात सुनकर साप सूंघ जाएगा । इसके बाद सापक कह दूंगा ‘‘आप लेग इतना नहीं कर सकते और फिर भी सदस्य बने रहना चाहते है तो स्‍कूल में क़्या हो रहा है उसपर ध्यान ना दें मैं हर बात संभालने के लिए हूं....’’ इसके बाद तो सबकी बोलती ही बंद हो जाएगी ।’’
स्‍कूल गए तो स्‍कूल में बच्चों के घर वालों का तांता लगा हुआ था । सबका एक ही सवाल था ‘‘आपके स्‍कूल को अभी तक मन्यता नहीं मिल सकी है । इस तरह तो आपके स्‍कूल में पढकर हमरे बच्चे की जिंदगी बर्बाद
हो जाएगी। वह कहीं का नहीं रहेगा... इस तरह हमरे बच्चे के जीवन से
तो ना खेलों ।’’
उनका एकही उत्तर होता
‘‘आप निश्चित राहिए, हमरी स्‍कूल को एक मस के भीतर मन्यता मिल जाएगी ।’’
बच्चों के घरवाले से छुटकारा मिल तो हेड मस्टर और टीचरों ने घेर लिया ।
‘‘सर हम इस आशा में कम वेतन मे भी कडी मेहनत से बच्चों को पढा रहे है कि ग्रांट मिलने के बाद हमें अच्‍छा वेतन मिलने लगेगा, परंतु यहां तो स्‍कूल की ग्रांट की बात तो दूर स्‍कूल को अभी मन्यता तक नहीं मिल सकी है ।’’
‘‘सब ठीक हो जाएगा आप लेग अपने अपने क़्लास में जाईए ।’’
उसके बाद उन्‍हों से#ोकटरी, क़्लार्एक, हेड मस्टर को आदेश दिया ।
बीडीओ, जेडपी, शिश सभापाति, शिश विभाग, शिश मंत्रालय, शिश मंत्री सब जगह एक कडा पत्र भेजिए । यदि एक महिने के भीतर हमरी स्‍कूल को मन्यता नहीं दी गई तो स्‍कूल के सदस्या, हेडमस्टर, शिशक, स्‍कूल में पढने वाले बच्चे और उनके घर वाले मंत्रालय के सामने भूख हडताल कर देंगे... देखिए इस पत्र से हलचल मच जाएगी और एक मस से पहले ही हमरे हाथो में स्‍कूल की मन्यता का पत्र आ जाएगा ।
उनकी बात सुनकर हर किसी की आंख में आशा की एक नई ज्योत जगमगाने लगी ।
वह धमकी भी कारगर साबित नहीं हो सकी थी । कुछ जगड़ों से तो धमकी का कोई उत्तर ही नहीं आया था । कुछ जगड़ों से टका सा जवाब आया था ‘‘नियमें के आनुसार आपकी स्‍कूल को मन्यता नहीं दी जा सकती ।’’
सबकी आखों के सामने अंधेरा छाया था ।
‘‘ठीक है’’ पता नहीं क़्यों फिर भी उनकी आवाज में आत्मविश्वास था। 20 तारीख को यहां से मंत्रालय तक एक मेर्चे का प्रबंध किया जाए । 20 तारीख को दिनभर पूरी मेनेजिंग बाडी, हेडमस्टर, स्‍कूल शिशक, तमम बच्चे और जो आने के लिए तैयार ड़ों ऐसे बच्चों के मं बाप को मंत्रालय के सामने धरना देना है और मन्यता ना मिलने तक भूख हडताल करनी है ।
‘जी’ सबने एक स्वर में उत्तर दिया ।
20 तारीख को दो गाडियों में 200 के लगभाग बच्चों को ठोंसकर भारा गया । जगह इतनी तंग थी कि बच्चे ना खडे हो सकते थे ना बैठा सकते थे । उन्‍हे सांस लेना काफ़्नि हो रहा था, दम घुट रहा था परंतु वे मुंह से कोई फारियाद नहीं कर सकते थे । फारियाद सुनने वाल कोई नहीं था । एक बडी सी गाडी में स्‍कूल की सदस्य सामिती के लेग थे । एक दूसरी छोटी गाडी में हेडमस्टर और शिशक। केवल कुछ ही बच्चों के घरवाले आ पाए थे उन्‍हे सीधे मेर्चे के स्थान पर आने के लिए कहा गया था ।
दो घंटे बाद गाडियां आजाद मौदान में जाकर रूकी । बच्चे गाडियों से उतरे तो उन्‍हे ऐसा अनुभव हुआ जैसे नरक की यात्रा से उन्‍हे मुएिक़्त मिल गई है। सूरज सर पर चढ आया था और आसमन से आग बरसा रहा था ।
मेर्चे की तैयारी की जाने लगी । बच्चों के हाथ ताख्तियां, बेनर देकर उन्‍हे नारे याद कराए जाने लगे । और जरूरी निर्देश दिए जाने लगे ।
‘‘सर पानी ! बहुत प्यास लगी है’’ कोई बच्चा बोल तो उसकी आवाज में सैकडों स्वर शामिल हो गए ।
‘‘अब यहां पानी कहा से मिलेगा । हम तो भूख हडताल करने आए है। पीने-खाने के लिए नहीं’’ एक टीचर ने उन्‍हे डांटा तो बच्चे अपने पकटे हुए होठोंं पर जीभा पेकरकर रह गए ।
प्यास से एंकठा में कांटे पडे थे । गले से आवाज नहीं निकल रही थी । उपर सिरपर सूरज आग बरसा रहा था । परंतु फिर भी वे पूरी ताकत लगाकर नारे लगाते लडखडाते कदमें से आगे बढ रहे थे
‘‘हमरी मंगे पूरी करो’’
‘‘हमरी स्‍कूल को मन्यता दो’’
‘‘हमरे जीवन से मत खेलों’’
‘‘शिश मंत्री हाय हाय’’
‘‘शिश विभाग हाय हाय’’
‘‘मुख्य मंत्री मुर्दा बाद’’
शिशक बच्चों पर नजर रखे हुए थे । उन्‍हे जोर जोर से नारे लगाने के लिए उकसाने कोई नारी नहीं लगाता तो उसे टोकते । आपस में बाते करने वालों को डांटते । उन्‍हे कतार मे यातायात से बचकर चलने के निर्देश देते ।
कमेटी के सदस्य मेर्चे के साथ एक दूसरे से फ़्ट्टा, मसखरी, हंसी मजाक करते चल रहे थे । कभी कोई सबके लिए आईस्#कीम या शर्बत ले आता या ठंडे की बोतले या फिर खाने की कोई चीज तो उनका आनंद लेते वे मेर्चे के साथ साथ चलते ।
दो घंटे बाद मेर्चा मंत्रालय पहुंच गया । मंत्रालय से पहले ही बडे से मौदान में पुलिस ने उन्‍हे रोक लिया ।
मौदान में सब धरना देकर बैठा गए ।
आगे आगे कमेटी के सदस्य, गुप्ताजी और से#ोकटरी थे । पीछे हेडमस्टर और शिशक और उनके पीछे बच्चे ।
सब जोर जोर से नारे लगा रहे थे ।
सभी को कडा निर्देश था कि वे इतनी जोर से चीखें कि मंत्रालय की छते हिल जाए ।
परंतु दस करोड जनता की चीखों से जिनका कुछ नहीं बिगडता था दो सौ बच्चों के नारे भाल उन छतों का क़्या बिगाड सकते थे ।
किसी मंत्री की गाडी आती तो ‘जिंदाबाद, मुर्दाबाद’ के नारे और जोर जोर से लगाए जाते ।
भूख प्यास से बच्चों का बुरा हाल था । उपर से तपतीधूप जिस जमीन पर बैठे थे वह भी तंदूर की तरह तप रही थी । बच्चों की आंखो के सामने अंधेरा छा रहा था । आचानक एक बच्चा चकराकर गिर पडा ।
सब उसकी ओर दौडे । उसे होश में लने की कोशिश की जाने लगी। मगर बच्चा आंखे नहीं खोलता था । समीप खडे डाक़्टर ने बच्चे को अच्‍छी तरह देखा और चिन्ता भारे स्वर मे बोल
‘‘बच्चे की हालत बहुत नाजूक है इसे तुरंत आस्पताल पहुंचाना जरूरी है ।’’
‘‘नहीं’’ गुप्ताजी डट गए । ‘‘चाहे बच्चे की जान चली जाए बच्चा धरने से नहीं हटेगा । जब तक हमरी मंग नही पूरी होगी कोई भी बच्चा नहीं उठेगा ।’’ इस बीच दो और बच्चे चकराकर गिर गए थे । कई बच्चों ने भूख-प्यास निबलर्ता से गर्दन अपने साथियों के कांधे पर डाल दी थी । कुछ निर्बलता, कमजोरी के कारण जमीन पर लेट गए थे ।
डाक़्टर और वहां पहरा देने वाली पुलिस के चेहरों पर हवाईया उड रही थीं ।
गुप्ताजी और सदस्यों के चेहरे पर विजयी मुस्कान नाच रही थी ।
खबरे मंत्रालय में पहुंची और वही हुआ तो ऐसे मौको पर होता है ।
मंत्रालय हिलने लगा ।
‘‘एकाध बच्चा मर गया तो विपक्ष और प्रेस सारा आसमन सिर पर उठा लेगा । हमरी जान का दुश्मन हो जाएगा । उन्‍हे कह दो कि वे धरना खत्म करके वापस अपने शहर चले जाए । उनकी मन्यता के बारे में गंभीरता से विचार किया जाएगा ।’’ एक से#ोकटरी बोल ।
‘‘सर वे मन्यता से किसी भी कम आश्वासन पर बात करने को तैयार नहीं है । सापक कहते है उनकी स्‍कूल को मन्यता दी जाएगी तभी धरने से
उठेंगे ।’’
इसबीच चार और बच्चों के बेहोश होने की खबर पहुंची ।
शिश मंत्री के सारे साचिव घबरा गए । मुख्यमंत्री के साचिव के भी कान खडे हो गए । बात मुख्य मंत्री तक पहुंच गई ।
‘‘तमशा बनाकर बात मत बढाओ । शिश मंत्री से तुरंत कहो कि मैंने कहा है उनकी स्‍कूल को मन्यता दे दें ।’’
नीचे आकर गुप्ताजी को यह खबर दे दी गई
‘‘शिश मंत्री ने आपके स्‍कूल को मन्यता दे दी है और वे आपसे बात करना चाहते है ।’’
गुप्ताजी का चेहरा गुलब की तरह खिल उठा था ।
‘‘मेरे प्यारे साथियों और बच्चों हमरा धरना सपकल रहा । जिस काम के लिए हमने धरना दिया था, मेर्चा निकाल था वह काम हो गया है । शिश मंत्री ने हमरी स्‍कूल को मन्यता दी है । इस धरने में हमें जो कळ हुए वे रंग लए । कुछ पाने के लिए कुछ खोना और सहना पडता है । अपने आधिकार की लडाई लडने और उन्‍हे प्राप्त करने में थोडी तकलीपक तो होती है । आप लेग धरना खत्म करके वापस अपने शहर जाए मैं और कमेटी सदस्य मंत्रीजी से बात करके आते है ...... ।’’ द द

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